Saturday, January 4, 2014

एक बार खुल कर जीना चाहता हूँ

Written by- Manoj Kumar Abhimanyu

एक बार खुल कर जीना चाहता हूँ
इस बेरंग ज़िन्दगी में रंग बिखेरना चाहता हूँ।

बरसों ने दिया मुझे तन्हाई की सौगात
खुशियों कि तलाश में गिनता रहा दिन रात!

सोचा था मिल जायेगा साथ किसी हमसफ़र का
छट जाएगा घना अँधेरा तब मेरी ज़िन्दगी का।

दिल के घावों पर मरहम खुद ही लगाना होता है
इंतज़ार के अनगिनत पलों को खुद ही में सिमेटना होता है।

न जाने कितनी बार दिया मुझे इस दिल ने धोखा
हर बार लेकिन मैं बेरंग खाली हाथ ही लौटा।

उम्मीदों का दामन छोड़ना कभी सिखा ही नहीं
खुशियो को गले लगाना कभी आया भी नहीं।

अंतहीन गहरी नींद में जाने से पहले
एक बार खुल कर जीना चाहता हूँ
इस बेरंग ज़िन्दगी में रंग बिखेरना चाहता हूँ।

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