मित्रों दुनिया के कुछ देशों में लोगों के बीच होड़ लगी है फॉरेन जाने की। चाहे लड़का हो या लड़की, बीस का हो या चालीस का, सबके मन की यही ख्वाइश की भाई विदेश जाना है। मैंने पूछा कि विदेश तो जाओगे, पगार कितनी पाओगे ? कहा तीस चालीस हजार तो महीने का मिल ही जाएगा। पूछा जॉब क्या है ? किसी ने कहा सिक्योरिटी स्टाफ की। दूसरे ने कहा शेफ की। एक ने कहा स्किल्ड लेबर की। बड़े शान से बताते हैं अपने यहाँ कि वो विदेश जा रहे हैं।
पर उनमें से एक और बन्दा भी मिला जो मुझे थोड़ा उदास सा लगा। मैंने उससे भी यही पूछा की वह किस जॉब के लिए जा रहा है। उसने बताया कि पहले भी वह फॉरेन में रह चूका है और करीब ढेड साल काम करने के बाद वह घर वापस आ गया था। उसने कहा वह मजबूरी में फिर से कंसल्टेंसी में इंटरव्यू के लिए जा रहा है। फॉरेन में बहुत शोषण करते हैं। तीसरे दर्जे का नागरिक समझते हैं। बात तो सही कहा उसने। फिर मैंने पूछा, दुबारा क्यों जा रहे हो ? उसने कहा सारी जिल्लतें और तकलीफ सहने के बाद भी जितने पैसे बचते हैं वो अपने घर भेज देते हैं ताकि उनके परिवार के लोग सुखी सम्पन्न हो सके। कुछ सालो के बाद जब अच्छे खासे पैसे जमा हो जाएंगे, तो अपने देश में उस पैसे से घर बनवायेंगे, घर आ कर व्यपार करेंगे।
ऐसे न जाने कितने युवा ऐसे ही सपनो में खोये दिन रात फॉरेन जाने की बाट जुहते हैं। अगर हम हमारे देश की बात करें तो बड़ा गर्व महसूस होता है जब देखता हूँ की टाटा ग्रुप ने या सन फार्मा ने और ऐसे ही न जाने कितने कंपनियों ने अपने यहाँ फॉरेनर्स को जॉब दिया है। हम दुनिया में विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। मगर सारे अर्थ का ८० फीसदी हिस्सा १० फीसदी लोगों के पास है और बाकी २० फीसदी हिस्से में ९० फीसदी आबादी है। काश इसका उल्टा होता !
मगर ऐसा कभी हो नहीं सकता कारण हम इस कदर संक्रमित हो चुके हैं कि हम ही नहीं हमारी आने वाली कई पीढ़ियां युगो युगो तक इसका दंश झेलेंगी। प्रकृति ने हमें विश्व की सबसे ऊर्व भूमि दी है , सबसे ज्यादा खनिज भण्डार दिए। मानव जीवन और हर प्रकार के जीव के लिए सबसे अनुकूल वातावरण दिया। किन्तु यह सब कुछ मुट्ठी भर लोगों की लालच का शिकार हो गया और हम गुलामी को स्वीकार कर चुके लोग आजादी के बाद भी अब अपने ही देश के उन चंद लोगों की सत्ता स्वीकार कर नरक सा जीवन जीने को मजबूर हैं।
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