Friday, February 28, 2014

किसी व्यक्ति के नाम में 'कुमार' शब्द और उसका महत्व

आज दफ्तर से लौटते वक़्त एक छोटा सा विषय मेरे दिमाग में कौतुहल पैदा कर गया।   हमारे कंपनी में कुछ बड़े ओहदों पर आसीन लोगों के नाम में 'कुमार' शब्द निहित है।  'कुमार' शब्द आज के ज़माने में कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी सफल लोगों के नाम में प्रत्यय का कार्य कर रहे हैं जो पहले के जमाने में कम ही दिखा करता था।   हां आज से कुछ दशक पहले तक 'कुमार' नाम कई फ़िल्म कलाकारों के हुआ करते थे। मित्रों, किसी के नाम में अगर 'कुमार' या 'कुमारी' हो तो, ऐसे में कई बार लोगों को यह ग़लतफ़हमी होती है कि वो बिहार से ही होंगे।   पर मैंने प्रायः देखा है कि 'कुमार' या 'कुमारी' शब्द पश्चिम और दक्षिण भारत में भी अनेकानेक लोगों के नाम में निहित होता है।

मुझे याद है बचपन से जब मैं अपने नाम में 'कुमार' देखता था तो मुझे ताज्जुब होता था कि मेरे ही नाम में 'कुमार' क्यूँ है जबकि मेरे दूसरे मित्रों के नाम के अंत में  'श्रीवास्तव', 'सिंह', 'सिन्हा', 'वर्मा', 'शर्मा ', 'यादव ', 'तिवारी', 'मेहता ' इत्यादि लगे होते थे।   ऐसा मेरे साथ न जाने कितनी बार हुआ कि लोगों ने मुझसे जब मेरा नाम पूछा और मैंने अपना नाम जब 'मनोज कुमार' बताया तो उन्होंने मुझसे फिर पूछा आगे क्या है ?  यानि कि वे ये उम्मीद कर रहे थे कि मेरे नाम के पीछे भी कोई 'सिंह', 'सिन्हा', 'यादव' इत्यादि जाति सूचक प्रत्यय जुड़े होंगे।   और जब मैं कहता था कि मेरा नाम तो यही है उन्हें बड़ी नाउम्मीदी होती थी।   उनके चेहरे पर लिखे भावों को देख कर मुझे खुद भी बड़ा अज़ीब लगता था, मैं खुद को अल्पसंख्यक महसूस करता था इस मायने में।   कुछ लोगों को तो मेरे जबाब से जब मेरे जाति का पता न होता था तो फिर मुझसे अगला प्रश्न करते थे कि मेरी जाति क्या है?  फिर मुझे बताना होता था कि मैं 'जायसवाल' हूँ।   अब फिर उनके चेहरे पर निराशा के भाव क्यूँ कि मैं किसी भी प्रभावकारी जाति समूह का अंग नहीं था।

अब  इस तरह के प्रश्न नहीं पूछे जाते ऐसा भी नहीं है।   हां अब पहले की तरह अक्सर इस तरह के सवाल का सामना मुझे ज्यादा नहीं करना पड़ता।   क्या सच में लोगों की सोच बदली है या क्यूंकि मैं पिछले करीब ७ वर्षों से कोल्कता महानगर में रह रहा हूँ, जहाँ के लोगों की सोच छोटे शहरों या गावों में रहने वाले लोगों की सोच से कतिपय भिन्न हैं, इस कारण मुझे इस तरह के प्रश्नो का सामना नहीं करना पड़ रहा ?  इस प्रश्न का उत्तर देने की स्थिति में मैं नहीं हूँ।  काश इस प्रकार की सोच में परिवर्तन राष्ट्रीय एवं सामाजिक स्तर पर हर वर्ग एवं हर जगह एक सामान रूप से हुआ होता।  किन्तु आज के राजनीतिक एवं सामाजिक परिदृश्य को देखते हुए नहीं लगता की ऐसा अभी तक सम्भव हो पाया है।   ख़ास कर तब जब कि जातिवादी राजनीति से भारत के अधिकाँश राजनीतिक दल ग्रसित नजर आते हैं।  और यही कारण है कि सबने जातियों के नाम पर अलग अलग वोट बैंक तैयार करके  रखा है।  मित्रों, हमारा समाज जाति -पाति के नाम पर इस कदर खंडित हो चूका है कि कभी कभी मुझे हम सबके सही मायने में शिक्षित होने पर शक होता है।  क्या हम सभ्य कहलाने के काबिल हैं ?  जाति अवश्य ही छुआ-छूत का प्रतीक है जिससे हम अभी तक निजात नहीं पा सके हैं।

मेरे माता - पिता ने मेरे नाम में 'जायसवाल' नहीं लगाया तो इसके पीछे कोई न कोई अच्छी सोच जरूर रही होगी।   शायद वे यह नहीं चाहते होंगे कि चूँकि मैं किसी प्रभावकारी जाति समूह का अंग नहीं, इससे अच्छा है कि जाति सूचक प्रत्यय को मेरे नाम से हटा ही दिया जाए।  मैंने इसके बारे में कुछ ज्यादा पढ़ा तो नहीं नहीं किन्तु कभी कभी ऐसा लगता है कि जाने - अनजाने ऐसे लोग जिन्होंने अपने बच्चों का नामकरण इस तरह किया है कि उससे उनके जाति का अनुमान नहीं लगाया जा सकता, उन्होंने जाति- पाति के चक्करों में फसे हमारे समाज को इससे बाहर निकालने के लिए एक धीमी किन्तु प्रभावकारी गति से चल रहे इस प्रयास को आंदोलन का स्वरूप देने की कोशिश की है।  मित्रों, सच में यह बहुत सुखद अनुभूति देने वाली बात है।  आज मुझे अपने नाम में 'कुमार' होने पर शर्म की अनुभूति नहीं होती बल्कि गर्व होता है कि दरअसल मैं किसी जाति सूचक सोच को प्रश्रय नहीं दे रहा।
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Tuesday, February 25, 2014

इंसानों के हवस के शिकार हमारे जंगल और उनमें रहने वाले जानवर

इंसानों ने जानवरो के घर उजाड़ दिये। न रहे घने जंगल, न रही निर्मल स्वच्छ नदियों की शीतल धारा।   अब बेचारे ये जंगल के जानवर जाएँ तो कहाँ जाएँ।   पैसे कमाने के जूनून में ज्यादा से ज्यादा जमीनों पर कब्ज़ा करने की जैसे होड़ सी मच गयी है।  चाहे वो निजी जमीन हो या सरकारी जमीन, संरक्षित जमीन हो या नदी तट के इलाके।   आज तो नदियों के मुहाने मोड़ कर, उनके रास्ते रोक कर भी ज़मीनो पर कब्जा किया जा रहा है।  कहीं तो उद्योग धंधे लगाए जा रहे हैं, कही खनन किया जा रहा है तो कहीं ऊँची ऊँची इमारते खड़ी की जा रही हैं।  खेतों के जमीन जब तेजी से अन्य कार्यों हेतु व्यवहार में लाये जा रहे हैं, फिर खेती की ज़मीन कहाँ से आये?  इसके लिए फिर जंगल काट कर खेती योग्य भूमि तैयार की जा रही है।   पर्वतीय इलाकों में चट्टानों को काट काट कर समतल किया जा रहा है।   पहाड़ नंगे हो रहे हैं।   क्या हो गया है हम सब को?  हम क्यूँ नहीं सीखते दक्षिण तटीय इलाकों में आये भयंकर सुनामी से, भुज में आये विनाशकारी भूकम्प से या उतराखंड में आयी भयावह त्रास्दी से ?

हर कुछ दिनों पर हम अखबारों में पढ़ते हैं कि ट्रैन से कट कर एक व्यस्क हाथी मारा गया।   फिर कई हाथियों ने अपने साथी के मारे जाने से नेशनल हाईवे जाम करके रखा है।   हाथियों के झुण्ड ने भोजन की तलाश में गाँव के खेत खलियान नष्ट कर दिए।   कई घरों में तबाही मचा दी।   अभी सुना एक हाथी के ढाई साल का बच्चा उसकी माँ के बीमार होने के वजह से अपने झुण्ड को छोड़ माँ के साथ ही रह गया।   उसकी माँ को बचाने की बहुत कोशिश की गयी मगर वो बच न सकी।   उसकी माँ के मरने के बाद भी वो उसके मृत शरीर के आस पास से हटने को तैयार न हुआ।  न जाने अपने झुण्ड से अलग होने के बाद उस बच्चे का क्या होगा?  शायद उसे किसी चिड़ियाखाने में लोगो के मनोरंजन के लिए रख देंगे।

एक तेंदुआ जो जंगल से भटक कर मेरठ शहर में इस घर से उस घर, इस गली से उस गली, मॉल एवं बाजारों में घूम रहा है।   वह तो खुद खौफजदा है, इतने सारे इंसानो के बीच।   एक बार शहर में आ जाने के बाद उसे वापस जंगल जाने का रास्ता नहीं मिल रहा, वैसे भी आज शहर जंगल से ज्यादा बड़े हो चुके हैं।   सूना रणथम्बोर का एक बाघ नरभक्षी बन चूका है।   वह भी इंसानो के बस्तियों में घूम रहा है, अब तक सात लोगों को मार चुका है।   उसको मारने के लिए बड़े बड़े शिकारी लगा दिए गए हैं।   विगत वर्षों में ऐसी घटनाओ में अक्सर नरभक्षी बाघों के बजाये निर्दोष बाघों को मार दिया गया।   सुंदरवन के बाघों की भी क्या गलती है, वे बेचारे तो जंगल में ही रहते आये हैं, मगर इंसानो ने वहाँ भी दूर दूर तक अपनी बस्तियां बसा ली हैं, टूरिस्ट सेण्टर, होटल्स खोल रखे हैं।  अब हर कुछ महीनो में बाघों के इंसानो पर अटैक की खबरें आती हैं तो इसमें दोष किसका है?   कभी हमारे भारत वर्ष में पुरे क्षेत्रफल का ८५ पर्तिशत जंगल हुआ करता था आज शायद १० पर्तिशत भी सही मायने में न बचे हों।   क्या हम और हमारी सरकार इस और पूरी निष्ठां के साथ सोचेंगे ?  अगर हमारे जंगल, नदियां, पर्वत, पशु, पक्षी नहीं रहेंगे तो फिर हमारा पर्यावरण क्या हम इंसानो के रहने के लायक बचेगा ?  नहीं चाहिए ऐसी तरक्की जिसमे इंसानो के हवस के वजह से प्रकृति इस कदर तबाह हो रही हो।

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Thursday, February 13, 2014

बिन पानी सब सुखा

                                               (कल्पना पर आधारित, वैलेंटाइन डे स्पेशल)

"मैं क्या करूँ ?  जिसे मैं पसंद करती हूँ, क्यूँ मेरी शादी उस लड़के से नहीं हो सकती ?  मेरे पेरेंट्स मेरे लिए बड़े और धनाढ्य घरानो के लड़के ढूंढने में क्यूँ लगे हैं?  कोई मेरी पसंद नहीं पूछ रहा। मुझे डर है, मैं किसी अनजान लड़के के साथ एडजस्ट नहीं कर पाउंगी।   पता नहीं वो कैसा हो ?  वो मुझे समझ पायेगा या नहीं ?  मैं ऐसी लाइफ जी नहीं सकती जिसमे कि शादी के बाद कम्पेटिबिलिटी न हो।   ऐसा हुआ तो मैं तो बुरी तरह टूट जाउंगी।   शायद तब मैं काफी ड्रास्टिक कदम उठा लूं।   मैं तो ज़रा सा मुझे कोई डांट भी दे तो रोने लगती हूँ , फिर कैसे मैं किसी ऐसे लड़के के साथ रह पाउंगी, जिसको मैं जानती नहीं।   मुझे उस लड़के से शादी करनी है जिसने मेरे साथ २ साल तक कम्पेटिशंस की तैयारी की है, जो बहुत अच्छा लड़का है, जिसे मैं अच्छी तरह जानती हूँ।   उसके अंदर कोई बुराई नहीं है - ड्रिंक नहीं करता, स्मोक नहीं करता - जैसे आज कल के ज्यादातर  लड़के किया करते हैं।   यहाँ तक कि मेरे भाई में भी कुछ एब हैं, मगर उस लड़के में मैंने आज तक कोई एब नहीं देखा।   वो तो बिल्कुल आपकी तरह है - केयरिंग, अंडरस्टैंडिंग और मोटिवेटिंग।   काफी इंटेलीजेंट भी है, हालांकि वो अभी भी क्लर्क के पोस्ट पर ही है।   मगर वह हमारे स्टडी पीरियड में हम सबसे ज्यादा मार्क्स ले कर आता था।   आज वो क्लर्क है और मैं ऑफिसर हूँ, मगर कल वह भी ऑफिसर बन जाएगा।  उसने बैंकिंग सिलेक्शन के कुछ रिटेन टेस्ट्स निकाले हुए हैं,  इंटरव्यू होना बाकी है तथा कुछ और जॉब्स के लिए भी तैयारी कर रहा है।   पर मेरे पेरेंट्स इस बात को क्यूँ नहीं समझते?

मुझे डर है मैं कुछ नहीं कर पाउंगी।   मेरे पेरेंट्स के मर्ज़ी के खिलाफ मैं कभी नहीं जा सकती।   पर वो अपनी बच्ची कि ख्वाइश क्यूँ नहीं समझते ?  मैं भी तो अब बड़ी हो चुकी हूँ,  मैं भी अपना भला- बुरा सोच सकती हूँ ना !   क्या अरेंज्ड मैरिज में सभी खुश हैं ?  मैं तो कितने लोगों को देख रही हूँ, अरेंज्ड मैरिज में भी खुश नहीं हैं।   और फिर लव मैरिज सफल न हो यह भी तो कोई ज़रूरी नहीं।   कितने लोग हैं जो लव मैरिज में खूब खुश हैं।   मैंने अपने घर में अपनी पसंद का ज़िक्र अपनी माँ से किया था, जिसके वजह से मेरे पापा उस लड़के के घर उसके पेरेंट्स से मिलने गए थे , मगर शायद मेरे पापा को यह रिश्ता पसंद नहीं आया।   इस कारण उन्होंने इस रिश्ते के लिए हाँ नहीं कहा।   पता नहीं क्यूँ, क्या प्रॉब्लम है अगर मैं ऑफिसर हूँ और वो क्लर्क है।  क्यूँ मेरे पेरेंट्स स्टेटस के पीछे पड़े हैं।"

मैं अपनी फ्रेंड की बात बड़े गौर से सुन रहा था।   बीच बीच में उसे दिलासे भी दे रहा था।   उसको यह बता रहा था कि उसकी गलती नहीं है , मगर चूँकि वो अपने पेरेंट्स के खिलाफ नहीं जा सकती, तो इस तरह परेशान हो कर, अपने वर्त्तमान को खो कर उसे क्या मिलेगा ? अगर किस्मत में हुआ तो उसकी पसंद के लड़के का जॉब ऑफिसर रैंक में जरूर हो जाएगा और तब उसके पैरेंटस भी इस  रिश्ते के लिए तैयार हो जायेंगे।   मगर वो बेचैन थी, काफी बेचैन थी।   उसे लगता है कि उसकी शादी के लिए अब उसके पेरेंट्स ज्यादा वेट नहीं करेंगे , और वो तीन-चार महीने में उसकी शादी कही न कहीं फाइनल कर ही देंगे और फिर वह कुछ नहीं कर पायेगी।   इसी मनोदशा के वजह से दो दिनों से उसने मुझसे ठीक से बात नहीं की थी।   मुझे इसके बारे में जरा भी आईडिया न था।   आज जब उसके साथ खुल कर बात हुई इस मुद्दे पर, वो एक छोटी सी बच्ची की तरह सब कुछ मेरे साथ शेयर करती चली गयी।   बार बार यह भी कहती रही कि जो मेरे साथ हुआ वो नहीं चाहती कि ऐसा कभी उसके साथ हो।  उसने कहा की वो मेरी मनोदशा समझ सकती है कि उस वक़्त मेरे साथ क्या गुज़रा होगा।   साथ ही उसने यह भी कहा कि मुझे उसकी बात का बुरा लग रहा होगा, मगर वो अपनी बात किसी और से शेयर नहीं कर सकती, ना तो अपने पेरेंट्स से और ना अपने भाई बहनो से - ऐसी बातें वो सिर्फ मेरे साथ शेयर कर सकती है।

इधर उसकी बातें सुन सुन कर मेरा दिल बिलख बिलख कर रो रहा था कि वो मुझसे ही कह रही है कि वो उस लड़के से शादी करना चाहती है जो मेरी तरह ही अच्छा, केयरिंग और इंटेलीजेंट है।   वो मुझसे तो शादी नहीं कर सकती मगर, हाँ उस लड़के से कर सकती है क्यूंकि शायद उसके घर में उसके पेरेंट्स उस लड़के के लिए तैयार हो जाएँ यदि उस लड़के का सिलेक्शन ऑफिसर रैंक में हो जाए।   मुझे इस बात का बहुत दुःख था कि जिस दौरान वो अपने जॉब कि प्रिपरेशन कर रही थी, उसने मुझे जरा भी खबर न लगने दी कि वो किसी लड़के को इतना पसंद करती है।   हम दोनों का वो स्ट्रोंग बांड शायद उसके मन में एक गिल्ट फीलिंग के वजह से था कि वो मेरे लिए कुछ न कर पायी थी उन दिनों जब मुझे उसके साथ की बहुत ज़रुरत थी।   मगर उसे भी इस बात का अच्छी तरह एहसास था कि हम नदी के दो किनारों की तरह हैं जो एक दूसरे से कभी नहीं मिल सकते। पिछले सात सालों में आज मुझे इस बात का एहसास कुछ ज्यादा ही हो रहा था।   अकेलेपन का एहसास दूर तक मुझे कचोटे जा रहा था।   मेरे दिल में एक सूनेपन का आगाज़ हो चुका था।  शायद निराशा का एक ऐसा दौर जिसका अंत इन साँसों के थमने का इंतज़ार कर रही हैं।

[समाप्त]

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Monday, February 10, 2014

युवाओं एवं किशोरों के दिल में वैलेंटाइन डे की दस्तक एक बार फिर

मैंने पिछले साल वैलेंटाइन डे के ऊपर अपने विचार लिखे थे।  इस बार फिर कुछ लिखने का मन हो रहा है।  अब टाइप करना स्टार्ट किया है तो कुछ लिखूंगा जरूर और मेरी कोशिश यही होगी कि आप सबको मेरा यह लेखन भी पसंद आये।   मात्र चार दिन रह गए हैं जब वैलेंटाइन डे एक बार फिर हम सबकी लाइफ में दस्तक देगा।   मुझे कुछ मित्रों ने आज पूछा कि इस वैलेंटाइन डे पर क्या प्लान है ?  खैर, मेरा प्लान तो मैं बाद में शेयर कर सकता हूँ।  मगर पहले मैं वैलेंटाइन डे की हमारे युवाओं के ऊपर प्रभाव का जिक्र करना चाहूंगा।

महानगरों में ही नहीं, वैलेंटाइन डे, फ्रेंड्स डे, रोज डे, चोक्लेट डे जैसे दिवसों ने अब छोटे शहरों को भी अपने प्रभाव में ले लिया है।   अतः हम इस सच्चाई से कतई मुँह नहीं मोड़ सकते कि हमारे किशोर एवं युवा लड़के और लडकियां इन दिवसों को किसी फेस्टिवल की तरह ही सेलिब्रेट करते हैं।  जब हम छोटे थे और स्कूल जाते थे तब इन दिवसों का इतना प्रभाव हमारे ऊपर नहीं था, हाँ तब भी हम न्यू इयर एक पर्व की तरह ही सेलिब्रेट करते थे।  आज के इन दिवसों के सेलिब्रेशन को युरोपीय संस्कृति से जोड़ कर शायद कुछ लोग देखते हों, किन्तु जिस तरह अंग्रेजी भाषा का देशी और भारतीय संस्करण जिसमें न जाने कितने तरह के एक्सेंट पाये जाते हैं जैसे, दक्षिण भारतीय एक्सेंट, बिहार और यु पी के लोगों का एक्सेंट, नॉर्थ ईस्ट के लोगों का एक्सेंट की भाँती ही, इन दिवसों का भी भारतीयकरण हो चूका है।   और हो भी क्यूँ ना ?  आज हम चाहे जितना भी यूरोप व अमेरिका जैसे देशों का विरोध करें, अपने बच्चों को अंग्रेजी या कान्वेंट स्कूलों में ही पढ़ाना चाहते हैं।   अंग्रेजी भले ही फर्राटेदार न बोलते हों, अपनी बोल चाल के भाषा में कम से कम ३० प्रतिशत अंग्रेजी के शब्द तो यूज करते ही हैं।  माता पिता अपने बच्चे के अंग्रेजी में भाषण देने, लेख लिखने, वाद विवाद प्रतियोगिता इत्यादि में उनके पुरूस्कार जितने पर अत्यंत गौरान्वित अनुभव करते हैं और इस बात को अपने हर मित्र और जानने वालो के साथ शेयर करते हैं।  आज माता पिता अपने बच्चों के लिए सपने देखते हैं कि बड़ा हो कर उनका लाड़ला या लाड़ली यूरोप या अमेरिका के किसी प्रतिष्ठीत यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करेगा और उनका नाम रोशन करेगा।

आज के अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले किशोर हिंदी या अपने रीजनल भाषा के फिल्मों के बजाये अंग्रेजी फिल्मों का बहुत ज्यादा शौक रखते हैं।  उनसे अगर आप हिंदी के फिल्मों का नाम पूछेंगे तो वो शायद उनका नाम भी न जानते हों।  हिंदी या रीजनल फिल्मों में काम करने वाले कुछ शीर्ष के अभिनेता व अभिनेत्रियों को छोड़ किसी का नाम भी उन्हें न मालूम हो किन्तु, अंग्रेजी के हर छोटे बड़े अभिनेता और अभिनेत्रियों के नाम के साथ साथ असंख्य अंग्रेजी फिल्मों के नाम और उनकी कहानी उन्हें मालूम होगी।  उनसे उनके मनपसंद किताब का नाम पूछ लीजिये, हर १० में से ८ लड़के लडकियां , विदेशी लेखकों के किताब का नाम लेंगे।  एक बच्चा जो ५ वर्ष की आयु से ही अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहा हो और जहाँ स्कूल में, अंग्रेजी शिक्षकों एवं सहपाठियों के साथ उसका काफी ज्यादा समय गुजरता हो, ऐसा होना तो स्वाभाविक ही है।

कभी कभी सोचता हूँ कि एक ऐसी संस्कृति जो मूलतः हमसे काफी भिन्न है कैसे ऐसे किशोरों एवं युवाओं को इतना प्रभावित करती है।   वे किस तरह अपने आप को विदेशी मानसिकता और परिवेश के समकक्ष पाते हैं ?  कभी कभी तो ऐसा लगता है यह सब एक दूसरे को दिखावा देने के लिए ही किया जाता है।   मॉडर्निटी के लिए एक अंधी दौड़ है जिसकी शुरुआत हो चुकी है।  किन्तु यह भी सच है कि हम अंग्रेज़ों तथा अमेरिकन और यूरोपियन लोगों से सर्वथा भिन्न हैं, जो उनके साथ उनके ही देश में रहने का मौका आने पर हमें खुद इस बात का एहसास हो जाता है कि वो हमें किस नज़र से देखते हैं और हमारे लिए उनके लाइफ स्टाइल को कॉपी करना कितना कठिन है।   खैर, अब तो ऐसा लगता है कि पश्चिमी सभ्यता से आयातित ऐसे दिवस अब हमारे देश का हिस्सा बन ही चुके हैं।   अतः अच्छा यही है कि हमारे बड़े-बुजुर्ग, माता- पिता एवं शिक्षक हमारे किशोरों एवं युवाओं के इन दिवसों के आकर्षण का विरोध न कर इन दिवसों को भारतीय लुक देने की कोशिश करें जिससे इन दिवसों से जुड़े साइड इफेक्ट्स को कम करने की कोशिश की जा सके।

मेरे कुछ युवा सहकर्मियों व मित्रों में इन दोनों मैं काफी उत्साह देख रहा हूँ।   इसमें दो तरह के लोग हैं, एक वो जो पहले से ही अपने पार्टनर के साथ प्रतिबद्ध हैं तो दूसरी तरफ ऐसे युवा जो अभी तक सिंगल हैं और किसी का अपने लाइफ में आने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं।   पर सभी खुश हैं , क्यूंकि एक मौका फिर आया है जब वे अपनी पसंद का इज़हार कर अपने सम्बन्ध को एक नया जोश एवं मजबूती प्रदान करेंगे जिनकी लाइफ में पहले से कोई पार्टनर है,  तथा दूसरे इस लिए खुश हैं क्यूँकि एक बार फिर उन्हें अपने पसंद को प्रोपोज करने का मौका मिलने वाला है।   किन्तु ऐसे मौकों पर कई युवाओं के दिल भी टूटते हैं जब उनका प्रयास विफल हो जाता है या मन में इच्छा के होते हुए भी कई बार युवा अपने मन की बात अपने पसंद पर जाहिर नहीं कर पाते।

जो भी हो, यह समय सबके मन में एक बार फिर से उत्साह जरूर ले कर आता है।   आप सबको भी इस अवसर पर अपार खुशियां मिले और आप सबकी ज़िन्दगी में एक प्यारा सा पार्टनर हो, इसी शुभेच्छा के साथ मैं अपना लेखन समाप्त करता हूँ।
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Sunday, February 9, 2014

१२० करोड़ की आबादी और हमारे देश का अंतराष्ट्रीय खेलों में वर्त्तमान प्रदर्शन

मित्रों, खेल जगत में आज भारत की टेस्ट क्रिकेट में मिली न्यूजीलैंड के हाथों पराजय के साथ ही भारत की अंतर्राष्ट्रीय भूमि पर गत ११ मैचों में से १० में पराजय तथा एक मैच का ड्रा होना, क्रिकेट प्रेमियों के लिए बड़ा ही दुखद अनुभव पेश करता है।  जहाँ एक और हम क्रिकेट में एक के बाद एक पराजय का दौर देख रहे हैं,  वही दूसरी तरफ भारतीय हॉकी की भी तस्वीर कोई ख़ास अच्छी नहीं है।  कभी हॉकी की दुनिया का बादशाह माने जाने वाला हमारा देश आज विश्व रैंकिंग में काफी पीछे खिसक चुका है।   विश्वस्तरीय हॉकी प्रतियोगिताओं में हाल के दौर में हमारे हॉकी टीम का प्रदर्शन शर्मशार कर देने वाला है।

मित्रों, आज कल इंडियन हॉकी लीग का दूसरा या तीसरा संस्करण देश के विभिन्न शहरों में आयोजित हो रहा है।   मगर देश का राष्ट्रीय खेल माने जाने वाले हॉकी एवं उसको बढ़ावा देने के लिए आई पी एल के तर्ज पर प्रारम्भ किये गए इस प्रतियोगिता को टीवी और मीडिया कोई महत्व नहीं दे रहे।   हां अखबारों के माध्यम से खेल पेज पर किसी छोटे से कॉलम में इसकी न्यूज़ मिल जाती है, वह भी आपको बहुत ध्यान से ढूंढना पड़ेगा।   हॉकी के प्रति इस प्रकार की उदासनीता देख कर मन बड़ा व्याकुल हो उठता है।   क्रिकेट के चकाचौंध ने हमारे न्यूज़ चैनल्स एवं उनके रिपोर्ट्स को भी दूसरे खेलों के प्रति अंधा बना कर रख छोड़ा है।  

भारतीय ओलिंपिक एसोसिएशन पर बैन लगने के बाद पहली बार इस वर्ष के विंटर ओलंपिक्स में हमारे देश के खिलाड़ी बिना हमारे देश के बैनर तले इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने गए हैं।  भारतीय खेल प्रेमियों के लिए यह कितने शर्म की बात है।  आज आनन् फानन में बी सी सी आई अध्यक्ष श्री एन श्रीनिवासन के भाई श्री एन रामचंद्रन को इंडियन ओलिंपिक एसोसिएशन का अध्यक्ष चुन लिया गया है।  विदित हो कि श्री एन श्रीनिवासन आई पी एल को ले कर पहले से ही काफी विवादों में ग्रस्त रहे हैं।  न्यूज़ रिपोर्ट्स के मुताबिक़ उनका आई सी सी का अध्यक्ष बनना भी तय है।  इस तरह देखें तो उनके विवादित पृष्ठभूमि के बावजूद उनके फाइनेंसियल क्लाउट के वजह से उन्हें प्रमोशन दिया जा रहा है।  

अंत में मित्रों इन सभी अंधकारमय परिस्थितियो के बावजूद हमारे कुछ जाबांज खिलाड़ियों का हाल का प्रदर्शन जरूर आपके साथ शेयर करना चाहूंगा।   भारत में आयोजित एक टेनिस चैलेंजर प्रतियोगिता के फाइनल में पहुचे भारत के नंबर १ पुरुष सिंगल्स खिलाड़ी सोमदेव देववर्मन को भारत के नंबर २ पुरुष सिंगल्स खिलाड़ी युकी भांभरी ने हराकर यह प्रतियोगिता जीत ली है। इसके साथ ही भारत के पुरुष सिंगल्स के दोनों ही शीर्ष खिलाड़ी विश्व के शीर्ष १५० खिलाड़ियों में शामिल हो गए हैं, जो कि भारतीय टेनिस इतिहास में पहली बार हुआ है।  पिछले कुछ दिनों से युकी भांभरी अंतराष्ट्रीय स्तर पर काफी अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं।  काफी समय से नंबर एक के स्थान पर काबिज सोमदेव देववर्मन को इस मैच में युकी के द्वारा उन्हें पराजित करना, भारतीय खिलाडियों के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता के शुरआत की दस्तक दे रहा है।  इस तरह की शुरुआत पहले बैडमिंटन में हम देख चुके हैं जहाँ विश्वस्तर की दो महिला खिलाड़ी साइना नेहवाल और पी वी सिंधु कई बार एक दूसरे से सेमीफाइनल या फाइनल में एक दूसरे से भिड़ती दिखती हैं।  वरना तो १२० करोड़ की आबादी वाले इस देश में हमें ज्यादातर यही देखने को मिलता है कि विश्व स्तर पर किसी खेल में एक खिलाड़ी टॉप की रैंकिंग में उभर कर आता है , लेकिन उसको चैलेंज करने वाला दूसरा कोई खिलाड़ी हमारा देश पैदा नहीं कर पाता।  
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Saturday, February 8, 2014

६ फ़रवरी २०१४ - मोदी जी की कोलकाता में ऐतिहासिक रैली


गत बुधवार दिनांक ६ फ़रवरी को मोदी जी की ऐतिहासिक रैली कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में हुई। मोदी जी जैसे कर्मठ, ईमानदार एवं राष्ट्रभक्त नेता को देखने और सुनने के लिए अगर बिज़नस स्टैण्डर्ड एवं कुछ अन्य अखबारो में छपे आंकड़ों पर विश्वास करें, तो करीब २ लाख की भीड़ आयी थी। बड़ी उत्सुकता थी, टीवी पर तो कई बार उन्हें देखा और सुना किन्तु सामने से उन्हें देखने की बात ही कुछ और होती है। जब आप लाखो लोगों को एक साथ मोदी मोदी का उच्चारण करते देखते हो, मन इस नेता के लिए लोगों की अपार श्रध्धा एवं उल्लासपूर्ण वातावरण को देख कर गदगद हो उठता है। इतने साधारण परिवार से उठ कर आज करोड़ों लोगों का हृदय सम्राट बने मोदी जी की बात अन्य नेताओं से बहुत भिन्न है। मैंने उनका कई भाषण टीवी पर सुना है और हर बार उन्हें देश को जोड़ने की बात ही करते देखा है, सबको साथ ले कर चलने की बात, चाहे वो हिन्दू हो या मुसलमान या किसी भी धर्म या पंथ को मानने वाला। देश का सर्वांगीण विकास तो उनका सबसे पहला एजेंडा है। घर घर को खुशहाल बनाने का उनका सपना और सोच जन जन के मन को सही मायने में छूती है और लोग स्वतः ही ऐसे राष्ट्रप्रेमी के साथ जुड़ते चले जाते हैं। इसी का परिणाम है कि मोदी जी न केवल उन राज्यों में जहा बीजेपी पहले से मौजूद है, अपने रैलियों में भीड़ इकट्ठी कर पाते हैं, बल्कि वे बाकी जगहों पर भी अप्रत्याशित जन समूह एकत्रित कर लेते हैं। लोग उन्हें देखने और सुनने खुद-ब-खुद आते हैं। कोलकाता की रैली में हम सबने अखबारों में पढ़ा कि उसमे हर वर्ग के लोग आये थे, मैनेजमेंट स्टूडेंट्स से ले कर टेकनोक्रेट्स, इंजीनियर्स, सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले ऑफिसर्स से ले कर बाबू तक, छोटे व्यवसायी से लेकर बड़े उद्योगपति तक, रिटायर्ड जज, पुलिस ऑफिसर्स, किसान, मजदूर और आम जन। जब मोदी जी के रैली स्थल पर पहुँचने के ठीक पहले उनके हेलीकाप्टर ने ब्रिगेड मैदान का दो बार चक्कर लगाया, तालियों की गड़गड़ाहट एवं मोदी मोदी की गूंज से पूरा मैदान उद्वेलित हो उठा। लोग अपना हाथ लहरा लहरा का उनका स्वागत करने को बेकरार थे। 

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Tuesday, February 4, 2014

दरिंदगी एक बार फिर केवल ४ वर्ष की बच्ची से

आज दिल्ली में ४ साल की बच्ची के साथ फिर बलात्कार की घटना हुई है।  ऐसे राक्षसों को कैसे सबक सिखाया जाए, किस तरह ऐसी घटनाओं को रोका जाए, किसी को समझ नहीं आ रहा।  कैसे किसी इंसान के मन में महज़ चार साल की बच्ची के लिए ऐसी सोच पैदा हो सकती है ?  और तो और यह बच्ची अपने घर के ही बाहर खेल रही थी, और बलात्कार करने वाला और कोई नहीं बल्कि उसके पड़ोस में रहने वाला ही एक युवा है जो उस बच्ची को वहाँ से उठा कर एक पार्क में ले जाकर ऐसा घृणित कृत्य करता है।  उस बच्ची के मानस पटल पर इसका कितना गहरा असर होगा, यह सोच कर भी रूह कॉप जाती है।  न जाने वह बच्ची किस अवस्था में है, अस्पताल में अपने जीवन की संघर्ष करती हुई यह बच्ची जिसे अभी संसार की बुराइयों के बारे में पता भी नहीं, एक नरभक्षी केवल एक चोकलेट के लालच में उसकी बोटी बोटी नोच लेता है। हालांकि इस दरिंदे को गिरफ्तार कर लिया गया है किन्तु ऐसी घटनाओं की बार बार पुर्नरावृति तथा युवाओं में पनपती ऐसी विपरीत मानसिकता के पीछे आखिर है क्या ?

क्या आपको नहीं लगता कि जहाँ एक तरफ क़ानून में महिलाओं के प्रति अशोभनीय व्यवहार के लिए सख्त से सख्त प्रावधान करने की कोशिश की जा रही है, वहीँ जिन चीज़ों को कानून के अनुसार फूहड़पन, वासना जनित अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया है, वो सब फिल्मों में न केवल खलनायकों द्वारा किये जाते बेरोकटोक दिखाए जाते हैं , बल्कि नायकों के द्वारा ऐसी कृत्यों के करने को सामान्य नोक झोंक की श्रेणी में डाल कर प्यार की शुरुआत की संज्ञा दे कर दर्शकों से ताली बटोरी जाती है।  फिल्में समाज को किस हद तक प्रभावित करती हैं, यह सर्वविदित है।  फिल्मों में आज कल जिस तरह से सेक्स और खुलेपन को बढ़ावा मिला है, वैसा आज से पहले कभी न था।   हर हाथ मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट के सस्ते दरों पर उपलब्धता इस मानसिक विकृति को पैदा करने में सहयोग कर रहे हैं।  किशोरावस्था में जब पोर्न क्लिप्स लोगों को उपलब्ध होंगे तो उनके मन में इस तरह के विचार आने स्वाभाविक ही हैं।

ऐसी घटनाएं रोकनी हैं तो हमारी सरकार को फिल्मों और इंटरनेट पर उपलब्ध वेब साइट्स को सख्ती के साथ रेगुलेट करना बहुत जरूरी है।  सेंसर बोर्ड्स को फिल्में पास करते समय, समाज में फ़ैल रही ऐसी विकृति को दिमाग में रख कर निर्णय लेना होगा।  हर गली नुक्कड़ पर, गाँव गाँव में पोर्न डिस्कस की उपलब्धता पर रोक लगानी होगी।  जहाँ ऐसे डिस्कस बनते हैं, उनके निर्माण व सप्लाई चेन को बंद करना होगा।  यह हज़ारो करोड़ का अवैधानिक एवं अनीतिक व्यापार बंद करना इतना आसान नहीं।  जहाँ न जाने कितने लोग सफेदपोश्त बन कर ऐसी घटनाओं का विरोध करते हैं, वहीँ इनमे से कई ऐसे हैं जिन्हे इन्ही विडियो पार्लर्स से हर हफ्ते अपने मनोरंजन के लिए ऐसी डिस्कस चाहिए होती है, वर्ना किसे पता नहीं कि हर गली नुक्कड़ पर ऐसी दुकाने हैं जहाँ ऐसी मूवीज की डिस्कस चंद  इतने रूपए में मिलते हैं जितने में आप एक कोन वाली आइस क्रीम खरीद सक्ते हैं।  और फिर इस व्यापार से होने वाली कमाई का एक बड़ा हिस्सा तो सरकारी महकमे में काम करने वाले उन लोगों को भी तो जाता है जिनका काम ऐसे अवैध कारोबार को रोकना है।

मित्रों, मैंने कुछ दिनों पहले अखबार में छपे एक रिपोर्ट में पढ़ा था कि किस तरह कूड़ा उठाने वाले बच्चे व किशोर अपनी दिन भर की कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन पोर्न मूवीज को देखने के लिए खर्च कर देते हैं।  कई बार तो ये ऐसी मूवीज को देखने के लिए वे अपना एक टाइम का खाना भी स्किप कर देते हैं।  आप पूछेंगे कि ऐसी मूवीज वो देखते कहा हैं ?  जी हाँ दिन में चाय और नाश्ते के रोड साइड कई स्टाल महानगरों में रात को दूकान बंद होने के बाद यह धंधा करते हैं।  यह रिपोर्ट अखबारों में तब आया था जब लोगों के विरोध के कारण ऐसी जगहों पर पुलिस को छापे मारने पड़े थे।  इसमें पकड़े गए ऐसे किशोरों से इंटरव्यू लेने के बाद कई नयी बातें पता चली थी।  बड़ी उम्र के किशोर अपने से छोटे बच्चों को जबर्दस्ती इस तरह की आदत डालते हैं और इसके एवज में इन किशोरों को कमीशन भी दिया जाता है।

हम सबों को इस बात को काफी गहराई से सोचने की जरूरत है कि इस विपरीत मानसिकता का शिकार कोई व्यक्ति हमारे पास पास कहीं भी हो सकता है और हम सबके बच्चे भी सुरक्षित नहीं हैं। ऐसी स्थिति में जहाँ हम बिजली, पानी, सड़क, वेतन वृद्धि की मांग करने के लिए जिस तरह आंदोलन करते हैं, क्या हमारा फ़र्ज़ नहीं है कि हम ऐसे कारोबार को बंद करने के लिए भी वैसे ही आंदोलन करें।  अपने आस पास के गली नुक्कड़ों में बिक रहे ऐसे डिस्कस के दुकानों पर ताला लगवाएं।  ऐसी फिल्मों को देखना बंद करें जिनमें आधुनिकता कि आड़ में फूहड़पन और सेक्स पेश किया जा रहा है।   मुझे आशा है मेरा यह प्रयास आप सबको जरूर सोचने पर मज़बूर करेगा।  धन्यवाद।
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प्रेम और वात्सल्य का प्रतीक - बसन्तोत्सव

मित्रों, बसंत पंचमी का ख्याल आते ही मन में एक उमंग की लहर दौड़ उठती है।  क्या बड़े, बूढ़े, नौजवान और बच्चे, यह पर्व सबके जीवन में खुशियां ले कर आता है।  यह वह समय है जब ठण्ड की तीव्रता कम होने लगती है और मौसम काफी खुशनुमा हो जाता है।  बसंत का मौसम वैसे भी पिकनिक एवं सैर सपाटे के लिए बहुत अनुकूल माना जाता है।   प्रायः शहरों से ज्यादा गावों में इस पर्व पर उत्साह पाया जाता है।  गीत, संगीत, नाच, गाने, झूले, मेले ये सब कड़ाके की ठण्ड के विदा होते ही सजीव हो उठते हैं।  हिन्दू धर्म के अनुसार यह पर्व कामदेव व उनकी पत्नी रति के प्रेम का प्रतीक है।   श्रृंगार रस एवं वसंत राग में सराबोर इस मौसम का असर शादी शुदा युवा युगल जोड़ों तथा शादी योग्य युवक युवतियों में प्रेम और वात्सल्य के आदान प्रदान के रूप में भी देखा जा सकता है।

इस पर्व को सरस्वती पूजा के रूप में भी मनाया जाता है।   विद्या, बुद्धि, कौशल, विज्ञान, तकनीक, कला और ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की अराधना पूरी श्रध्धा एवं हर्षोल्लास के साथ की जाती है।  मंदिरों एवं शिक्षा संस्थानों में देवी की प्रतिमा को पीली साडी पहना कर पीले फूलों एवं आभूषणो से उनका श्रृंगार कर के उनकी पूजा की जाती है।  प्रसाद के रूप में नाना प्रकार के फल एवं मिठाइयां वितरित की जाती है।   कई स्थानो पर इस उपलक्ष्य में भोज भी आयोजित किये जाते हैं।   प्रेम व भक्ति रस में डूबे युवा शिक्षार्थी इस अवसर पर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश करते हैं।  शिक्षा शँस्थानो एवं होस्टल्स में हर्षोल्लास का ऐसा वातावरण होता है कि पूछो मत।  कतार में खड़े युवा नए नए वस्त्र पहन कर एक दूसरे के हॉस्टल में जा कर वहाँ की पूजा का आनंद लेते हैं, एक दूसरे के गालों पर गुलाल लगाते हैं और प्रसाद ले कर फिर अगले हॉस्टल या संस्थान की तरफ बढ़ जाते हैं।  इन संस्थानो एवं होस्टल्स में दूसरे से अच्छी पूजा का आयोजन करने की होड़ लगी रहती है।   मैंने अपने शिक्षण काल में यह सब बड़े नजदीक से अनुभव किया है।  साल का यही एक मात्र दिन होता है जब गर्ल्स हॉस्टल बॉयज के लिए खुला होता है और इस दौरान पूजा में शामिल युवक युवतियां अपने प्रेमी या प्रेमिका के उनके हॉस्टल आने का बेसब्री से इंतज़ार करते पाये जाते हैं।

मित्रों यह पर्व भारतवर्ष के विभिन्न प्रांतों में अलग अलग नामों से मनाया जाता है।  पंजाब में जहाँ इसे पतंगोत्सव के रूप में मनाया जाता है तो बंगाल में इसे श्रीपंचमी के नाम से जाना जाता है।  यह दिन युवाओं के लिए वैलेंटाइन डे का देसी संस्करण भी होता है।  युवतियां इस दिन अक्सर रंग बिरंगी साड़ियां पहनती हैं और अपने साथी के साथ यह वक़्त गुजारना पसंद करती हैं।  वसंत पंचमी से ले कर अगले ४० दिन हर्षोल्लास, लोक गीत, लोक नृत्य एवं अन्य सांस्कृतिक आयोजनो का समय होता है जिसका अंत होलिका दहन एवं होली के पावन पर्व के रूप में होता है।  मित्रों, आप भी वसंत के रंगों में शामिल हो जाइये और अपने जीवन के सारे दुःख एवं परेशानियों को भूल कर इस वासंती मौसम का भरपूर आनंद लीजिये।  आप सभी को वसंत पंचमी एवं सरस्वती  पूजा का हार्दिक अभिनन्दन !

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India in 2050 : on course of becoming an economic superpower and alleviating poverty

Day before yesterday I was discussing with my friends how despite so much of progress we have failed to provide the living standard to maj...