आज दफ्तर से लौटते वक़्त एक छोटा सा विषय मेरे दिमाग में कौतुहल पैदा कर गया। हमारे कंपनी में कुछ बड़े ओहदों पर आसीन लोगों के नाम में 'कुमार' शब्द निहित है। 'कुमार' शब्द आज के ज़माने में कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी सफल लोगों के नाम में प्रत्यय का कार्य कर रहे हैं जो पहले के जमाने में कम ही दिखा करता था। हां आज से कुछ दशक पहले तक 'कुमार' नाम कई फ़िल्म कलाकारों के हुआ करते थे। मित्रों, किसी के नाम में अगर 'कुमार' या 'कुमारी' हो तो, ऐसे में कई बार लोगों को यह ग़लतफ़हमी होती है कि वो बिहार से ही होंगे। पर मैंने प्रायः देखा है कि 'कुमार' या 'कुमारी' शब्द पश्चिम और दक्षिण भारत में भी अनेकानेक लोगों के नाम में निहित होता है।
मुझे याद है बचपन से जब मैं अपने नाम में 'कुमार' देखता था तो मुझे ताज्जुब होता था कि मेरे ही नाम में 'कुमार' क्यूँ है जबकि मेरे दूसरे मित्रों के नाम के अंत में 'श्रीवास्तव', 'सिंह', 'सिन्हा', 'वर्मा', 'शर्मा ', 'यादव ', 'तिवारी', 'मेहता ' इत्यादि लगे होते थे। ऐसा मेरे साथ न जाने कितनी बार हुआ कि लोगों ने मुझसे जब मेरा नाम पूछा और मैंने अपना नाम जब 'मनोज कुमार' बताया तो उन्होंने मुझसे फिर पूछा आगे क्या है ? यानि कि वे ये उम्मीद कर रहे थे कि मेरे नाम के पीछे भी कोई 'सिंह', 'सिन्हा', 'यादव' इत्यादि जाति सूचक प्रत्यय जुड़े होंगे। और जब मैं कहता था कि मेरा नाम तो यही है उन्हें बड़ी नाउम्मीदी होती थी। उनके चेहरे पर लिखे भावों को देख कर मुझे खुद भी बड़ा अज़ीब लगता था, मैं खुद को अल्पसंख्यक महसूस करता था इस मायने में। कुछ लोगों को तो मेरे जबाब से जब मेरे जाति का पता न होता था तो फिर मुझसे अगला प्रश्न करते थे कि मेरी जाति क्या है? फिर मुझे बताना होता था कि मैं 'जायसवाल' हूँ। अब फिर उनके चेहरे पर निराशा के भाव क्यूँ कि मैं किसी भी प्रभावकारी जाति समूह का अंग नहीं था।
अब इस तरह के प्रश्न नहीं पूछे जाते ऐसा भी नहीं है। हां अब पहले की तरह अक्सर इस तरह के सवाल का सामना मुझे ज्यादा नहीं करना पड़ता। क्या सच में लोगों की सोच बदली है या क्यूंकि मैं पिछले करीब ७ वर्षों से कोल्कता महानगर में रह रहा हूँ, जहाँ के लोगों की सोच छोटे शहरों या गावों में रहने वाले लोगों की सोच से कतिपय भिन्न हैं, इस कारण मुझे इस तरह के प्रश्नो का सामना नहीं करना पड़ रहा ? इस प्रश्न का उत्तर देने की स्थिति में मैं नहीं हूँ। काश इस प्रकार की सोच में परिवर्तन राष्ट्रीय एवं सामाजिक स्तर पर हर वर्ग एवं हर जगह एक सामान रूप से हुआ होता। किन्तु आज के राजनीतिक एवं सामाजिक परिदृश्य को देखते हुए नहीं लगता की ऐसा अभी तक सम्भव हो पाया है। ख़ास कर तब जब कि जातिवादी राजनीति से भारत के अधिकाँश राजनीतिक दल ग्रसित नजर आते हैं। और यही कारण है कि सबने जातियों के नाम पर अलग अलग वोट बैंक तैयार करके रखा है। मित्रों, हमारा समाज जाति -पाति के नाम पर इस कदर खंडित हो चूका है कि कभी कभी मुझे हम सबके सही मायने में शिक्षित होने पर शक होता है। क्या हम सभ्य कहलाने के काबिल हैं ? जाति अवश्य ही छुआ-छूत का प्रतीक है जिससे हम अभी तक निजात नहीं पा सके हैं।
मेरे माता - पिता ने मेरे नाम में 'जायसवाल' नहीं लगाया तो इसके पीछे कोई न कोई अच्छी सोच जरूर रही होगी। शायद वे यह नहीं चाहते होंगे कि चूँकि मैं किसी प्रभावकारी जाति समूह का अंग नहीं, इससे अच्छा है कि जाति सूचक प्रत्यय को मेरे नाम से हटा ही दिया जाए। मैंने इसके बारे में कुछ ज्यादा पढ़ा तो नहीं नहीं किन्तु कभी कभी ऐसा लगता है कि जाने - अनजाने ऐसे लोग जिन्होंने अपने बच्चों का नामकरण इस तरह किया है कि उससे उनके जाति का अनुमान नहीं लगाया जा सकता, उन्होंने जाति- पाति के चक्करों में फसे हमारे समाज को इससे बाहर निकालने के लिए एक धीमी किन्तु प्रभावकारी गति से चल रहे इस प्रयास को आंदोलन का स्वरूप देने की कोशिश की है। मित्रों, सच में यह बहुत सुखद अनुभूति देने वाली बात है। आज मुझे अपने नाम में 'कुमार' होने पर शर्म की अनुभूति नहीं होती बल्कि गर्व होता है कि दरअसल मैं किसी जाति सूचक सोच को प्रश्रय नहीं दे रहा।
--------------------------------------------------------------------
मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे।
मुझे याद है बचपन से जब मैं अपने नाम में 'कुमार' देखता था तो मुझे ताज्जुब होता था कि मेरे ही नाम में 'कुमार' क्यूँ है जबकि मेरे दूसरे मित्रों के नाम के अंत में 'श्रीवास्तव', 'सिंह', 'सिन्हा', 'वर्मा', 'शर्मा ', 'यादव ', 'तिवारी', 'मेहता ' इत्यादि लगे होते थे। ऐसा मेरे साथ न जाने कितनी बार हुआ कि लोगों ने मुझसे जब मेरा नाम पूछा और मैंने अपना नाम जब 'मनोज कुमार' बताया तो उन्होंने मुझसे फिर पूछा आगे क्या है ? यानि कि वे ये उम्मीद कर रहे थे कि मेरे नाम के पीछे भी कोई 'सिंह', 'सिन्हा', 'यादव' इत्यादि जाति सूचक प्रत्यय जुड़े होंगे। और जब मैं कहता था कि मेरा नाम तो यही है उन्हें बड़ी नाउम्मीदी होती थी। उनके चेहरे पर लिखे भावों को देख कर मुझे खुद भी बड़ा अज़ीब लगता था, मैं खुद को अल्पसंख्यक महसूस करता था इस मायने में। कुछ लोगों को तो मेरे जबाब से जब मेरे जाति का पता न होता था तो फिर मुझसे अगला प्रश्न करते थे कि मेरी जाति क्या है? फिर मुझे बताना होता था कि मैं 'जायसवाल' हूँ। अब फिर उनके चेहरे पर निराशा के भाव क्यूँ कि मैं किसी भी प्रभावकारी जाति समूह का अंग नहीं था।
अब इस तरह के प्रश्न नहीं पूछे जाते ऐसा भी नहीं है। हां अब पहले की तरह अक्सर इस तरह के सवाल का सामना मुझे ज्यादा नहीं करना पड़ता। क्या सच में लोगों की सोच बदली है या क्यूंकि मैं पिछले करीब ७ वर्षों से कोल्कता महानगर में रह रहा हूँ, जहाँ के लोगों की सोच छोटे शहरों या गावों में रहने वाले लोगों की सोच से कतिपय भिन्न हैं, इस कारण मुझे इस तरह के प्रश्नो का सामना नहीं करना पड़ रहा ? इस प्रश्न का उत्तर देने की स्थिति में मैं नहीं हूँ। काश इस प्रकार की सोच में परिवर्तन राष्ट्रीय एवं सामाजिक स्तर पर हर वर्ग एवं हर जगह एक सामान रूप से हुआ होता। किन्तु आज के राजनीतिक एवं सामाजिक परिदृश्य को देखते हुए नहीं लगता की ऐसा अभी तक सम्भव हो पाया है। ख़ास कर तब जब कि जातिवादी राजनीति से भारत के अधिकाँश राजनीतिक दल ग्रसित नजर आते हैं। और यही कारण है कि सबने जातियों के नाम पर अलग अलग वोट बैंक तैयार करके रखा है। मित्रों, हमारा समाज जाति -पाति के नाम पर इस कदर खंडित हो चूका है कि कभी कभी मुझे हम सबके सही मायने में शिक्षित होने पर शक होता है। क्या हम सभ्य कहलाने के काबिल हैं ? जाति अवश्य ही छुआ-छूत का प्रतीक है जिससे हम अभी तक निजात नहीं पा सके हैं।
मेरे माता - पिता ने मेरे नाम में 'जायसवाल' नहीं लगाया तो इसके पीछे कोई न कोई अच्छी सोच जरूर रही होगी। शायद वे यह नहीं चाहते होंगे कि चूँकि मैं किसी प्रभावकारी जाति समूह का अंग नहीं, इससे अच्छा है कि जाति सूचक प्रत्यय को मेरे नाम से हटा ही दिया जाए। मैंने इसके बारे में कुछ ज्यादा पढ़ा तो नहीं नहीं किन्तु कभी कभी ऐसा लगता है कि जाने - अनजाने ऐसे लोग जिन्होंने अपने बच्चों का नामकरण इस तरह किया है कि उससे उनके जाति का अनुमान नहीं लगाया जा सकता, उन्होंने जाति- पाति के चक्करों में फसे हमारे समाज को इससे बाहर निकालने के लिए एक धीमी किन्तु प्रभावकारी गति से चल रहे इस प्रयास को आंदोलन का स्वरूप देने की कोशिश की है। मित्रों, सच में यह बहुत सुखद अनुभूति देने वाली बात है। आज मुझे अपने नाम में 'कुमार' होने पर शर्म की अनुभूति नहीं होती बल्कि गर्व होता है कि दरअसल मैं किसी जाति सूचक सोच को प्रश्रय नहीं दे रहा।
--------------------------------------------------------------------
मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे।