Thursday, February 13, 2014

बिन पानी सब सुखा

                                               (कल्पना पर आधारित, वैलेंटाइन डे स्पेशल)

"मैं क्या करूँ ?  जिसे मैं पसंद करती हूँ, क्यूँ मेरी शादी उस लड़के से नहीं हो सकती ?  मेरे पेरेंट्स मेरे लिए बड़े और धनाढ्य घरानो के लड़के ढूंढने में क्यूँ लगे हैं?  कोई मेरी पसंद नहीं पूछ रहा। मुझे डर है, मैं किसी अनजान लड़के के साथ एडजस्ट नहीं कर पाउंगी।   पता नहीं वो कैसा हो ?  वो मुझे समझ पायेगा या नहीं ?  मैं ऐसी लाइफ जी नहीं सकती जिसमे कि शादी के बाद कम्पेटिबिलिटी न हो।   ऐसा हुआ तो मैं तो बुरी तरह टूट जाउंगी।   शायद तब मैं काफी ड्रास्टिक कदम उठा लूं।   मैं तो ज़रा सा मुझे कोई डांट भी दे तो रोने लगती हूँ , फिर कैसे मैं किसी ऐसे लड़के के साथ रह पाउंगी, जिसको मैं जानती नहीं।   मुझे उस लड़के से शादी करनी है जिसने मेरे साथ २ साल तक कम्पेटिशंस की तैयारी की है, जो बहुत अच्छा लड़का है, जिसे मैं अच्छी तरह जानती हूँ।   उसके अंदर कोई बुराई नहीं है - ड्रिंक नहीं करता, स्मोक नहीं करता - जैसे आज कल के ज्यादातर  लड़के किया करते हैं।   यहाँ तक कि मेरे भाई में भी कुछ एब हैं, मगर उस लड़के में मैंने आज तक कोई एब नहीं देखा।   वो तो बिल्कुल आपकी तरह है - केयरिंग, अंडरस्टैंडिंग और मोटिवेटिंग।   काफी इंटेलीजेंट भी है, हालांकि वो अभी भी क्लर्क के पोस्ट पर ही है।   मगर वह हमारे स्टडी पीरियड में हम सबसे ज्यादा मार्क्स ले कर आता था।   आज वो क्लर्क है और मैं ऑफिसर हूँ, मगर कल वह भी ऑफिसर बन जाएगा।  उसने बैंकिंग सिलेक्शन के कुछ रिटेन टेस्ट्स निकाले हुए हैं,  इंटरव्यू होना बाकी है तथा कुछ और जॉब्स के लिए भी तैयारी कर रहा है।   पर मेरे पेरेंट्स इस बात को क्यूँ नहीं समझते?

मुझे डर है मैं कुछ नहीं कर पाउंगी।   मेरे पेरेंट्स के मर्ज़ी के खिलाफ मैं कभी नहीं जा सकती।   पर वो अपनी बच्ची कि ख्वाइश क्यूँ नहीं समझते ?  मैं भी तो अब बड़ी हो चुकी हूँ,  मैं भी अपना भला- बुरा सोच सकती हूँ ना !   क्या अरेंज्ड मैरिज में सभी खुश हैं ?  मैं तो कितने लोगों को देख रही हूँ, अरेंज्ड मैरिज में भी खुश नहीं हैं।   और फिर लव मैरिज सफल न हो यह भी तो कोई ज़रूरी नहीं।   कितने लोग हैं जो लव मैरिज में खूब खुश हैं।   मैंने अपने घर में अपनी पसंद का ज़िक्र अपनी माँ से किया था, जिसके वजह से मेरे पापा उस लड़के के घर उसके पेरेंट्स से मिलने गए थे , मगर शायद मेरे पापा को यह रिश्ता पसंद नहीं आया।   इस कारण उन्होंने इस रिश्ते के लिए हाँ नहीं कहा।   पता नहीं क्यूँ, क्या प्रॉब्लम है अगर मैं ऑफिसर हूँ और वो क्लर्क है।  क्यूँ मेरे पेरेंट्स स्टेटस के पीछे पड़े हैं।"

मैं अपनी फ्रेंड की बात बड़े गौर से सुन रहा था।   बीच बीच में उसे दिलासे भी दे रहा था।   उसको यह बता रहा था कि उसकी गलती नहीं है , मगर चूँकि वो अपने पेरेंट्स के खिलाफ नहीं जा सकती, तो इस तरह परेशान हो कर, अपने वर्त्तमान को खो कर उसे क्या मिलेगा ? अगर किस्मत में हुआ तो उसकी पसंद के लड़के का जॉब ऑफिसर रैंक में जरूर हो जाएगा और तब उसके पैरेंटस भी इस  रिश्ते के लिए तैयार हो जायेंगे।   मगर वो बेचैन थी, काफी बेचैन थी।   उसे लगता है कि उसकी शादी के लिए अब उसके पेरेंट्स ज्यादा वेट नहीं करेंगे , और वो तीन-चार महीने में उसकी शादी कही न कहीं फाइनल कर ही देंगे और फिर वह कुछ नहीं कर पायेगी।   इसी मनोदशा के वजह से दो दिनों से उसने मुझसे ठीक से बात नहीं की थी।   मुझे इसके बारे में जरा भी आईडिया न था।   आज जब उसके साथ खुल कर बात हुई इस मुद्दे पर, वो एक छोटी सी बच्ची की तरह सब कुछ मेरे साथ शेयर करती चली गयी।   बार बार यह भी कहती रही कि जो मेरे साथ हुआ वो नहीं चाहती कि ऐसा कभी उसके साथ हो।  उसने कहा की वो मेरी मनोदशा समझ सकती है कि उस वक़्त मेरे साथ क्या गुज़रा होगा।   साथ ही उसने यह भी कहा कि मुझे उसकी बात का बुरा लग रहा होगा, मगर वो अपनी बात किसी और से शेयर नहीं कर सकती, ना तो अपने पेरेंट्स से और ना अपने भाई बहनो से - ऐसी बातें वो सिर्फ मेरे साथ शेयर कर सकती है।

इधर उसकी बातें सुन सुन कर मेरा दिल बिलख बिलख कर रो रहा था कि वो मुझसे ही कह रही है कि वो उस लड़के से शादी करना चाहती है जो मेरी तरह ही अच्छा, केयरिंग और इंटेलीजेंट है।   वो मुझसे तो शादी नहीं कर सकती मगर, हाँ उस लड़के से कर सकती है क्यूंकि शायद उसके घर में उसके पेरेंट्स उस लड़के के लिए तैयार हो जाएँ यदि उस लड़के का सिलेक्शन ऑफिसर रैंक में हो जाए।   मुझे इस बात का बहुत दुःख था कि जिस दौरान वो अपने जॉब कि प्रिपरेशन कर रही थी, उसने मुझे जरा भी खबर न लगने दी कि वो किसी लड़के को इतना पसंद करती है।   हम दोनों का वो स्ट्रोंग बांड शायद उसके मन में एक गिल्ट फीलिंग के वजह से था कि वो मेरे लिए कुछ न कर पायी थी उन दिनों जब मुझे उसके साथ की बहुत ज़रुरत थी।   मगर उसे भी इस बात का अच्छी तरह एहसास था कि हम नदी के दो किनारों की तरह हैं जो एक दूसरे से कभी नहीं मिल सकते। पिछले सात सालों में आज मुझे इस बात का एहसास कुछ ज्यादा ही हो रहा था।   अकेलेपन का एहसास दूर तक मुझे कचोटे जा रहा था।   मेरे दिल में एक सूनेपन का आगाज़ हो चुका था।  शायद निराशा का एक ऐसा दौर जिसका अंत इन साँसों के थमने का इंतज़ार कर रही हैं।

[समाप्त]

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