Saturday, October 18, 2014

Can a colleague be as close as your friends during your study years?

One of my colleagues recently commented, "It's not easy to find a true friend among colleagues."  I too want to explore this opinion of his.  Friendship is something we know we don't have to have a formal way of expressing the things to each other. If you are true friends, there is no mutual commitments that you need to have.  It's a personal choice of yours and if you don't want to be friends with someone, you can back out any time you wish.  But if the bond of friendship is strong, it will pull you back to him or her.  

Now let's come to the colleagues or co-workers.  It's true till the time you started working you had already lived early part of your youth in schools and colleges and in all probability in a group of friends you did all informal, naughty, crazy and weird things.  Surely you must have got those friends during your school and college phases.   But that was say for twenty five yours of your life. You still have to lead your next fifty years.  Your friends till your twenty five when you are now in your thirties, are all settled in their lives, they are now in jobs, they have their own families.  They mostly are in different cities.  Now you are hardly in touch with most of them since the times have changed and so did you.  Accept the reality and move on.   

Then what still is left with you.  Man is a God gifted social animal as we say.  Therefore, a rapport is required with the time to develop a friendship with someone, be it anyone.  It may be your co-worker, your client, your neighbour or the persons whom you meet at the jogging park in the morning.   But yes you need to realize they won't be your weird, crazy friends.  Yes you are now grown up and they too.  The child inside you is there to whom only those can understand who grew up with you and not all.  But then they don't have time for you now.  But those who you are with now due to your job commitments or otherwise have time for you but they can't know you that much as your school or college friends knew you.  If your expectations are that high, you would never be able to meet them now.  Yes there are some exceptions too.   

We talk about someone having married to his or her colleague.  That happens, but then this usually happens when they chose each other for the sake of marriage selecting each other out of many.  This is certainly not a friendship of colleagues.  It's meeting of two hearts but usually after long considerations of many other factors for securing good future and for convenience of being together at work and at home.   Therefore certainly it's a mutual give and take and so not in the same category that you find your friends in your early years of life.  Well as far as wife and husband should be true friends, I agree it should be.  Probably initially they don't happen to be but with the time as they grew up older they might become and those couples are really lucky.  I think everyone wants to have this kind of ideal relationship in his or her marriage.  

Well friends, reduce your expectations is the only medicine for those who are as emotional as I am as far as finding true friend at this stage of life is concerned.  At least your mind will be at peace.

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Tuesday, October 14, 2014

एक तेरा साथ हमको दो जहाँ से प्यारा है

अभी मोहम्मद रफ़ी साहब और लता मंगेशकर जी के गाये गीत 'एक तेरा साथ हमको दो जहाँ से प्यारा है' सुन रहा था।   मित्रों, यह गाना मेरे बचपन के सबसे प्रिय गानो में से एक है।   उस वक़्त ऑडियो कैसेट्स का दौर था।   मुझे याद है मैं घंटो कैसेट पारलर में खड़े हो कर मोहम्मद रफ़ी के गाने ढूंढता था।   एच एम वी  और ग्रामोफ़ोन कंपनी के कैसेट्स के पास ही ज्यादातर राइट्स हुआ करते थे ऐसे ओरिजिनल गानो के।   बस लालसा भरी नज़रों से देखा करता था, खरीदने के लिए जेब में पैसे तो होते नहीं थे।  किसी तरह पॉकेट मनी जो बचाई ज्यादातर ब्लेंक कैसेट्स ले कर गाने कॉपी करवा लेता था।  एच एम वी के ब्लेंक कैसेट्स में करीब १५ - १६ गाने कॉपी हो जाते थे।   फिर उनको दिन रात सुनना।   मुझ पर मोहम्मद रफ़ी साहब के गानो का जादुई प्रभाव है।   मेरे पास ऐसे दो सौ के आस पास कैसेट्स इकट्ठे हो गए होंगे।   मोहम्मद रफ़ी के बाद मेरे सबसे पसंदीदा गायक कलाकार थीं लता जी और आशा जी।  पुरुष गायकों में मुझे किशोर कुमार भी बहुत पसंद थे।  दूसरी तरफ मुझे याद है मुझे मुकेश के गाने बहुत ही कम पसंद थे।   पर ये मेरे बचपन की बात थी।   आज जब मुकेश को सुनता हूँ , ऐसा लगता है उनके जैसी परिपक्वता किसी भी गायक के आवाज़ में नहीं थी।   आज वही मुकेश मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।   

मित्रों, मैंने ऊपर जिस गाने का जिक्र किया है उसका वीडियो या यह फिल्म मैंने नहीं देखा था।   आज यू ट्यूब पर इस गाने को ढूंढा और फिर पुरानी यादें ताज़ा हो गयी।  आज इंटरनेट के सुलभ हो जाने तथा यू ट्यूब जैसे साइट्स के उपलब्ध होने के कारण हर  हार्ड डिस्क में सैकड़ो गाने उपलब्ध होते हैं जिनके लिए अलग से महंगे कैसेट्स या डी वी डी खरीदने की जरूरत नहीं होती।    इसी क्रम में आज जब इस गीत के ब्लैक और वाइट संस्करण को देखा, मन प्रसन्नचित्त हो उठा।   गाने के दोनों अभिनेता काफी प्यारे दिखते हैं।   मैं दोनों को शायद पहली बार देख रहा हूँ क्यूंकि यह बहुत ही पुरानी मूवी का गाना है और इससे पहले इसका वीडियो देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका।   

शादी के बाद की पहली रात जिसमे दो अनजान लोग जब साथ मिलते थे तो उनके दिलों में जो प्यार के मीठे मीठे सपने होते होंगे उसको जीवंत रूप देता यह गाना सच में यह सोचने पर मजबूर करता है कि उस दौर के लोग कितने शांत, सुशील और शर्मीले होते थे।   दोनों ही कलाकारों के चेहरे पर इनोसेंस देख कर मन मंत्रमुग्ध हो जाता है , वैसे भी यह गाना रात के सन्नाटे में अकेलेपन में सुनना एक अलौकिक एहसास कराता है।  मुझे हमेशा से ये महसूस होता आया है कि रफ़ी साहब और लता जी दोनों के जिह्वा पर माँ सरस्वती विराजमान होती थी तभी उस दौर में ऐसे दिव्य गाने बनते थे।   
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Monday, October 6, 2014

रेल का सफर - भांति भांति के लोग और कुछ अविस्मरणीय यादें

मित्रों, मैं पिछले दिनों अपने माता-पिता के घर पटना गया था।   हावड़ा स्टेशन से जन शताब्दी ट्रेन में बैठ पटना के लिए रवाना हुआ था।  अक्सर ट्रेन में आपने देखा होगा कि आपने जो बर्थ बुक की होगी, कोई न कोई आपसे उस बर्थ के लिए रिक्वेस्ट करके आपको किसी और जगह बिठा देगा।   ख़ास कर तब जबकि आप अकेले सफर कर रहे हों।   बिल्कुल ऐसा ही हुआ इस बार भी।   मित्रों इस ट्रेन में सिटींग अरेंजमेंट होती है, स्लीपिंग बर्थ नहीं होती।   एक अधेड़ उम्र की महिला अपने बेटी के साथ सफर कर रही थी उनके कहने पर मैंने अपनी सीट चेंज कर ली किन्तु मेरे उस दत्तक सीट पर एक उन्नीस-बीस साल का लड़का बैठा था।  उसके बगल के सीट पर उसकी हमउम्र महिला मित्र सफर कर रही थी।  मैंने जब उस सीट के बारे में पूछ ताछ की तो पता चला की वो लड़का बस उस लड़की को सी ऑफ करने आया था।  खैर मैं ट्रेन स्टार्ट होने तक उनके बीच व्यवधान पैदा न करना ही उचित समझ एक दूसरी खाली सीट पर बैठ गया।   मित्रों यह सफर करीब आठ - नौ घंटे का होता है।   मगर आपको इसमें इतने भांति-भांति के लोग मिलेंगे कि आपको यह सफर इतना उबाऊ नहीं लगेगा।   इस बार तो कुछ ऐसा हुआ कि मैंने सोचा इसे मुझे अपने पाठकों के साथ जरूर साझा करना चाहिए।  तो मित्रों, लीजिये मेरे साथ आप भी मेरे इस सफर का आनंद उठाइये।

मित्रों ट्रेन में काफी भीड़ भाड़ थी क्यूंकि दुर्गापूजा की छुट्टियों में सब लोग अपने अपने घर जा रहे थे।  जिनकी रिजर्वेशन कन्फर्म थी वो भी और जिनकी कन्फर्म न हो सकी थी वो भी।  उनमे से कइयों की जिनकी कन्फर्म सीट थी उन्हें लड़ झग़ड़ कर अपनी सीट खाली करवानी पड़ रही थी क्यूंकि उस पर पहले से कोई बैठा मिलता था।  खैर आये दिन ट्रेनों में यह सब दिखता आया है इसमें नया कुछ नहीं।   नया तो अब ये भी नहीं रहा कि मेरे उस दत्तक सीट पर बैठे लड़के का हाथ अपने हाथ में लेकर उसकी प्रेमिका उसकी आँखों में डूबी प्यार के हिचकोले खा रही थी की तभी अचानक ट्रेन ने सिटी बजाई और फिर उस लड़के को ट्रेन से उतरना पड़ा।   खिड़की से भी लड़की ने लड़के का हाथ ऐसे पकड़ा था जैसे कि छोड़ना ही न हो।   भाई यह देख कर हमें भी हमारी पुरानी यादें ताज़ी हो गयी।   खैर ट्रेन स्टार्ट होने पर उस लड़की को अपने प्रेमी को विदा करना पड़ा।   तभी एक तीस-पैतीस साल की महिला अपने हाथ में भारी सा बैग लिए हुई पहुंची और हमारे ही रो में उस लड़की के दूसरी साइड (विंडो) की सीट की तरफ इशारा करते हुए वहाँ बैठे एक दूसरी महिला को वहां से उठने का निर्देश दिया।   फिर थोड़ी जद्दोजहद के बाद वह सीट उस महिला को मिल गयी।  तो मित्रों मैं उस रो में दो महिलाओं के साथ बैठा था।   एक उन्नीस-बीस और दूसरी तीस-पैंतीस की।  अब दोनों महिलाओं ने बात-चित शुरू कर दी।  देखते देखते दोनों के बीच चाची-भतीजी का रिश्ता कायम हो गया।   अब इसमें मुझे संदेह है कि क्या सचमुच दूसरी महिला को पहले वाली से ऑन्टी कहलाना अच्छा लग रहा था।   मैं बोर हो रहा था तो अपने मोबाइल फ़ोन के साथ बिजी होने का असफल प्रयत्न करने लगा।   तीन चार घंटे ऐसे किसी तरह निकाल लिए।

ट्रेन जसीडीह स्टेशन पहुचने वाली थी।   तभी देखा एक व्यक्ति ट्रेन के दरवाजे से लटक कर पास की विंडोज पर बैठे लोगों से पुछ रहा था कि विंडो से पानी किसने फेंका।  किसी ने ना कहा और किसी ने उसको कोई रिस्पांस नहीं दिया।   जैसे ही ट्रेन स्टेशन पर रुकी, वह प्लेटफार्म पर आकर हर विंडो पर जा कर पूछने लगा की पानी किसने गिराया।   जिसके हाथ में बोतल दिखा उसकी तरफ इशारे करके पूछने लगा कि उसने ही पानी गिराया है।   तो मेरी पड़ोस के पड़ोस में विंडो साइड पर बैठी महिला से भी उसने बकझक करना शुरू कर दिया।   महिला ने उसको समझाने की कोशिश की कि लोगों के पास पीने का पानी नहीं है वो पानी क्यों गिराएंगे ?  फिर मेरे पड़ोस की युवा महिला ने उस व्यक्ति को कहा कि क्या उसने किसी को पानी फेंकते देखा है?  हम सबने इस बात का समर्थन किया।  इतना सुनते ही वह व्यक्ति तैश में आते हुए कहने लगा कि अगर उसने देखा होता तो उसका गला पकड़ कर ट्रेन से बाहर निकाल लेता।  इतना सुन कर लड़की को काफी गुस्सा आ गया और कहने लगी की उस व्यक्ति को कोई तमीज नहीं है, औरतों से कैसे बात की जाती है।  फिर वह व्यक्ति हम सबको ललकारने लगा की निकल बाहर साले हम यहाँ के लोकल हैं।  हम लोगों ने कहा की वो आदमी ड्रिंक किये हुए है और उससे जुबान लड़ाने का कोई फायदा नहीं।  इधर ट्रेन भी खुल गयी मगर लड़की का गुस्सा सातवें आसमान पर था।   उसने भी माँ बहन की जितनी कॉमन गालियां हैं सब एक के बाद एक देनी शुरू कर दी।   फिर उसने कहा की वो पहचानता नहीं कि वो लड़की किस खानदान से है अगर उसके पापा को पता चला तो खड़े खड़े उसका मर्डर हो जाएगा।  पुरे बॉगी के लोग उसकी तरफ ही देख रहे थे।  लड़की की हाइट मुश्किल से ५ फिट होगी, बिल्कुल दुबली पतली, मगर आवाज़ और गुस्सा उफ़।   खैर मुझसे रहा न गया, मैंने उसको शांत कराने की भरपूर कोशिश की।   उसे कहा की जिसने गुस्ताखी की वो तो चला गया, उसने तो तुम्हारी ना गाली सुनी, ना ही धमकी।   हां तुम्हारे गुस्से को इस बॉगी के सारे लोगों ने जरूर देखा।   धीरे धीरे उसने इस बात को समझा और नार्मल हुई।  

मित्रों, बिहार में आपको ऐसे लोगों से आये दिन सामना करना पड़ सकता है।   ऐसे लोग अक्सर गरीब, मध्यम वर्गीय, निराश व कम पढ़े लिखे व्यक्ति होंगे।   लड़ना झगड़ना शायद उन्हें अच्छा लगता है , वे आपको अपने लेवल तक ला कर आपको बेइज्जत करने की कोशिश करेंगे।   ऐसे लोगों के कभी मुँह नहीं लगना चाहिए।   एक और बात जो बिहारियों में काफी सामान्य है चाहे वो जितने भी पढ़े लिखे हों, और वो ये क़ि वे अपने आप को अंडरवर्ल्ड का डॉन से किसी तरह से कम नहीं समझते।   यहाँ मैं डिस्क्लेमर देना चाहता हूँ क़ि यह बात हर बिहारी पर लागू नहीं होती।   मित्रों मेरे इस ट्रेन जर्नी में कहानी के दोनों मुख्य पात्र इस बात को सिद्ध करते दिखते हैं।   तो चलिए अब मैं कहानी को आगे बढ़ाता हूँ।

लड़की को समझाने के दौरान मैंने अपने वाक् कला का परिचय दिया जिससे प्रभावित होकर वह मुझे अंकल अंकल कह कर सहज तरीके से सम्बोधित करने लगी।  तो मित्रों उस लड़की के एक तरफ बैठी उसकी मुँहबोली ऑन्ट और दूसरी तरफ मुँहबोले अंकल।   बातचीत का क्रम आगे बढ़ा।   उसने बताया कि वो अपने मम्मी पापा से मिलने महाराजगंज (सीवान ) जा रही है।   उसके पापा कांट्रेक्टर हैं और उसका बचपन कालिम्पोंग में बीता है।   उसकी स्कूलिंग कालिम्पोंग में ही हुई है।   अभी वह प. बंगाल के एक इंजीनियरिंग कॉलेज से बी.टेक कर रही है।   अभी उसका पांचवा सेमेस्टर चल रहा है।  

मित्रों मैंने अक्सर २० - २५ वर्ष आयु वर्ग के लोगों को अपने से करीब दस वर्ष बड़े लोगों को अंकल या ऑन्ट कहते देखा है।  शायद उनके पर्सनालिटी का एक हिस्सा अपरिपक्व रह गया है ऐसा मेरा मानना है।   ऐसे लोग व्यवहारिक नहीं होते और उनके अंदर आत्मविश्वास की कमी पायी जाती है।   ऐसे लोग अपने आस पास व रिश्तेदारों या माता-पिता पर बहुत ज्यादा आश्रित होते हैं।   ऐसे केसेज में अक्सर इन बच्चों से ज्यादा उनके माता पिता का दोष होता है जो उन्हें हमेशा खुद पर आश्रित बना कर रखते हैं।   मैंने उस लड़की के उस कमी को पहचानते हुए इस बात को समझाया।   उसने मेरी बात को धैर्य से सुना और माना कि मैं ठीक कह रहा हूँ।  फिर वह मेरे साथ काफी फ्रेंडली हो गयी और अपने बारे में बहुत कुछ शेयर किया जो लिखना चाहू तो यह आर्टिकल काफी लम्बा हो जाएगा। इसलिए मैं रेलवेन्ट बातों को ही साझा करूंगा।

उसने मुझे बताया कि वो लड़का जो उसे छोड़ने आया था वो उसका बॉय फ्रेंड है।  लड़का बंगाली है और उसके क्लास में ही पढता है।  उसने यह बात अपने घर में किसी को नहीं बतायी है हालांकि वो उससे ही शादी करना चाहती है।   मेरे ये पूछने पर कि उसने यह बात अपने घर में क्यूं नहीं बताया है, उसने बोला कि घर में यह बात मालूम होने पर उसकी पढ़ाई छुड़ा कर घर में बिठा देंगे।   वह राजपूत है और राजपूतों में दूसरे जाति में शादी करने की सोचते भी नहीं, प्रेम विवाह तो उसके खानदान में बहुत दूर की बात है।   उसने यह भी बताया कि उसके खानदान में वो पहली लड़की है जो बाहर जाकर अकेले रह कर इंजीनियरिंग कर रही है।

मित्रों, मैंने अक्सर देखा है ऐसे केसेज में जहाँ जहाँ लड़के लडकियां अपने कॉलेज में प्रेम तो कर लेते हैं, माँ-बाप की नजरों से बच कर काफी नजदीकी सम्बन्ध भी बना लेते हैं किन्तु परस्थितियाँ दोनों को जुदा कर देती हैं।   कभी जाती-पाती तो कभी स्टेटस और कभी गोत्र।   खैर मैंने उस लड़की को जिस तरह उस लड़के के साथ चिपके देखा था ट्रेन में उस भीड़ के बीच, यह तो समझ आ गया था कि वो उसके बहुत क्लोज आ चुकी थी, मैंने उसको समझाया कि वह प्यार की सीमा को समझे और समय का इंतज़ार करे।   जब वो दोनों जॉब में आ कर सेटल हो जाएँ तभी घर वालों को बताएं और शादी के बारे में सोचें।   इस बीच हर घंटे वो अपने प्रेमी को फ़ोन करके उसका हाल चाल ले रही थी।   उसके पापा का भी बीच बीच में फ़ोन आता था कि उसकी ट्रेन किस स्टेशन तक पहुंची।   उसके पापा उसी रात अपने पर्सनल कार में उसको पटना से महराजगंज ले जाने वाले थे।

खैर मेरा सफर तो इस तरह गुजर गया मगर इस दौरान मुझे बहुत कुछ देखने और समझने को मिला।   आशा है मेरा यह लेखन आपको पसंद आया होगा जिसमे मैंने कुछ ऐसे प्रश्न चित्रित करने कि कोशिश की है जिनका निराकरण अभी बाकी है।   एक परिवर्तन का दौर है - पुरानी और नयी सोच का एक टकराव है।   बदलते दौर की मांग के अनुसार माता-पिता को भी बदलने की जरूरत है, समाज को बदलने की जरूरत है और हां युवाओं को भी धैर्य रखने की जरूरत है,   सही और गलत में फर्क करने की जरूरत है वरना अच्छी खासी हसती खेलती ज़िन्दगी बर्बाद होने में देर नहीं लगती।   जय हिन्द मित्रों !

======================================================================== मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे।

India in 2050 : on course of becoming an economic superpower and alleviating poverty

Day before yesterday I was discussing with my friends how despite so much of progress we have failed to provide the living standard to maj...