मित्रों, मैं पिछले दिनों अपने माता-पिता के घर पटना गया था। हावड़ा स्टेशन से जन शताब्दी ट्रेन में बैठ पटना के लिए रवाना हुआ था। अक्सर ट्रेन में आपने देखा होगा कि आपने जो बर्थ बुक की होगी, कोई न कोई आपसे उस बर्थ के लिए रिक्वेस्ट करके आपको किसी और जगह बिठा देगा। ख़ास कर तब जबकि आप अकेले सफर कर रहे हों। बिल्कुल ऐसा ही हुआ इस बार भी। मित्रों इस ट्रेन में सिटींग अरेंजमेंट होती है, स्लीपिंग बर्थ नहीं होती। एक अधेड़ उम्र की महिला अपने बेटी के साथ सफर कर रही थी उनके कहने पर मैंने अपनी सीट चेंज कर ली किन्तु मेरे उस दत्तक सीट पर एक उन्नीस-बीस साल का लड़का बैठा था। उसके बगल के सीट पर उसकी हमउम्र महिला मित्र सफर कर रही थी। मैंने जब उस सीट के बारे में पूछ ताछ की तो पता चला की वो लड़का बस उस लड़की को सी ऑफ करने आया था। खैर मैं ट्रेन स्टार्ट होने तक उनके बीच व्यवधान पैदा न करना ही उचित समझ एक दूसरी खाली सीट पर बैठ गया। मित्रों यह सफर करीब आठ - नौ घंटे का होता है। मगर आपको इसमें इतने भांति-भांति के लोग मिलेंगे कि आपको यह सफर इतना उबाऊ नहीं लगेगा। इस बार तो कुछ ऐसा हुआ कि मैंने सोचा इसे मुझे अपने पाठकों के साथ जरूर साझा करना चाहिए। तो मित्रों, लीजिये मेरे साथ आप भी मेरे इस सफर का आनंद उठाइये।
मित्रों ट्रेन में काफी भीड़ भाड़ थी क्यूंकि दुर्गापूजा की छुट्टियों में सब लोग अपने अपने घर जा रहे थे। जिनकी रिजर्वेशन कन्फर्म थी वो भी और जिनकी कन्फर्म न हो सकी थी वो भी। उनमे से कइयों की जिनकी कन्फर्म सीट थी उन्हें लड़ झग़ड़ कर अपनी सीट खाली करवानी पड़ रही थी क्यूंकि उस पर पहले से कोई बैठा मिलता था। खैर आये दिन ट्रेनों में यह सब दिखता आया है इसमें नया कुछ नहीं। नया तो अब ये भी नहीं रहा कि मेरे उस दत्तक सीट पर बैठे लड़के का हाथ अपने हाथ में लेकर उसकी प्रेमिका उसकी आँखों में डूबी प्यार के हिचकोले खा रही थी की तभी अचानक ट्रेन ने सिटी बजाई और फिर उस लड़के को ट्रेन से उतरना पड़ा। खिड़की से भी लड़की ने लड़के का हाथ ऐसे पकड़ा था जैसे कि छोड़ना ही न हो। भाई यह देख कर हमें भी हमारी पुरानी यादें ताज़ी हो गयी। खैर ट्रेन स्टार्ट होने पर उस लड़की को अपने प्रेमी को विदा करना पड़ा। तभी एक तीस-पैतीस साल की महिला अपने हाथ में भारी सा बैग लिए हुई पहुंची और हमारे ही रो में उस लड़की के दूसरी साइड (विंडो) की सीट की तरफ इशारा करते हुए वहाँ बैठे एक दूसरी महिला को वहां से उठने का निर्देश दिया। फिर थोड़ी जद्दोजहद के बाद वह सीट उस महिला को मिल गयी। तो मित्रों मैं उस रो में दो महिलाओं के साथ बैठा था। एक उन्नीस-बीस और दूसरी तीस-पैंतीस की। अब दोनों महिलाओं ने बात-चित शुरू कर दी। देखते देखते दोनों के बीच चाची-भतीजी का रिश्ता कायम हो गया। अब इसमें मुझे संदेह है कि क्या सचमुच दूसरी महिला को पहले वाली से ऑन्टी कहलाना अच्छा लग रहा था। मैं बोर हो रहा था तो अपने मोबाइल फ़ोन के साथ बिजी होने का असफल प्रयत्न करने लगा। तीन चार घंटे ऐसे किसी तरह निकाल लिए।
ट्रेन जसीडीह स्टेशन पहुचने वाली थी। तभी देखा एक व्यक्ति ट्रेन के दरवाजे से लटक कर पास की विंडोज पर बैठे लोगों से पुछ रहा था कि विंडो से पानी किसने फेंका। किसी ने ना कहा और किसी ने उसको कोई रिस्पांस नहीं दिया। जैसे ही ट्रेन स्टेशन पर रुकी, वह प्लेटफार्म पर आकर हर विंडो पर जा कर पूछने लगा की पानी किसने गिराया। जिसके हाथ में बोतल दिखा उसकी तरफ इशारे करके पूछने लगा कि उसने ही पानी गिराया है। तो मेरी पड़ोस के पड़ोस में विंडो साइड पर बैठी महिला से भी उसने बकझक करना शुरू कर दिया। महिला ने उसको समझाने की कोशिश की कि लोगों के पास पीने का पानी नहीं है वो पानी क्यों गिराएंगे ? फिर मेरे पड़ोस की युवा महिला ने उस व्यक्ति को कहा कि क्या उसने किसी को पानी फेंकते देखा है? हम सबने इस बात का समर्थन किया। इतना सुनते ही वह व्यक्ति तैश में आते हुए कहने लगा कि अगर उसने देखा होता तो उसका गला पकड़ कर ट्रेन से बाहर निकाल लेता। इतना सुन कर लड़की को काफी गुस्सा आ गया और कहने लगी की उस व्यक्ति को कोई तमीज नहीं है, औरतों से कैसे बात की जाती है। फिर वह व्यक्ति हम सबको ललकारने लगा की निकल बाहर साले हम यहाँ के लोकल हैं। हम लोगों ने कहा की वो आदमी ड्रिंक किये हुए है और उससे जुबान लड़ाने का कोई फायदा नहीं। इधर ट्रेन भी खुल गयी मगर लड़की का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसने भी माँ बहन की जितनी कॉमन गालियां हैं सब एक के बाद एक देनी शुरू कर दी। फिर उसने कहा की वो पहचानता नहीं कि वो लड़की किस खानदान से है अगर उसके पापा को पता चला तो खड़े खड़े उसका मर्डर हो जाएगा। पुरे बॉगी के लोग उसकी तरफ ही देख रहे थे। लड़की की हाइट मुश्किल से ५ फिट होगी, बिल्कुल दुबली पतली, मगर आवाज़ और गुस्सा उफ़। खैर मुझसे रहा न गया, मैंने उसको शांत कराने की भरपूर कोशिश की। उसे कहा की जिसने गुस्ताखी की वो तो चला गया, उसने तो तुम्हारी ना गाली सुनी, ना ही धमकी। हां तुम्हारे गुस्से को इस बॉगी के सारे लोगों ने जरूर देखा। धीरे धीरे उसने इस बात को समझा और नार्मल हुई।
मित्रों, बिहार में आपको ऐसे लोगों से आये दिन सामना करना पड़ सकता है। ऐसे लोग अक्सर गरीब, मध्यम वर्गीय, निराश व कम पढ़े लिखे व्यक्ति होंगे। लड़ना झगड़ना शायद उन्हें अच्छा लगता है , वे आपको अपने लेवल तक ला कर आपको बेइज्जत करने की कोशिश करेंगे। ऐसे लोगों के कभी मुँह नहीं लगना चाहिए। एक और बात जो बिहारियों में काफी सामान्य है चाहे वो जितने भी पढ़े लिखे हों, और वो ये क़ि वे अपने आप को अंडरवर्ल्ड का डॉन से किसी तरह से कम नहीं समझते। यहाँ मैं डिस्क्लेमर देना चाहता हूँ क़ि यह बात हर बिहारी पर लागू नहीं होती। मित्रों मेरे इस ट्रेन जर्नी में कहानी के दोनों मुख्य पात्र इस बात को सिद्ध करते दिखते हैं। तो चलिए अब मैं कहानी को आगे बढ़ाता हूँ।
लड़की को समझाने के दौरान मैंने अपने वाक् कला का परिचय दिया जिससे प्रभावित होकर वह मुझे अंकल अंकल कह कर सहज तरीके से सम्बोधित करने लगी। तो मित्रों उस लड़की के एक तरफ बैठी उसकी मुँहबोली ऑन्ट और दूसरी तरफ मुँहबोले अंकल। बातचीत का क्रम आगे बढ़ा। उसने बताया कि वो अपने मम्मी पापा से मिलने महाराजगंज (सीवान ) जा रही है। उसके पापा कांट्रेक्टर हैं और उसका बचपन कालिम्पोंग में बीता है। उसकी स्कूलिंग कालिम्पोंग में ही हुई है। अभी वह प. बंगाल के एक इंजीनियरिंग कॉलेज से बी.टेक कर रही है। अभी उसका पांचवा सेमेस्टर चल रहा है।
मित्रों मैंने अक्सर २० - २५ वर्ष आयु वर्ग के लोगों को अपने से करीब दस वर्ष बड़े लोगों को अंकल या ऑन्ट कहते देखा है। शायद उनके पर्सनालिटी का एक हिस्सा अपरिपक्व रह गया है ऐसा मेरा मानना है। ऐसे लोग व्यवहारिक नहीं होते और उनके अंदर आत्मविश्वास की कमी पायी जाती है। ऐसे लोग अपने आस पास व रिश्तेदारों या माता-पिता पर बहुत ज्यादा आश्रित होते हैं। ऐसे केसेज में अक्सर इन बच्चों से ज्यादा उनके माता पिता का दोष होता है जो उन्हें हमेशा खुद पर आश्रित बना कर रखते हैं। मैंने उस लड़की के उस कमी को पहचानते हुए इस बात को समझाया। उसने मेरी बात को धैर्य से सुना और माना कि मैं ठीक कह रहा हूँ। फिर वह मेरे साथ काफी फ्रेंडली हो गयी और अपने बारे में बहुत कुछ शेयर किया जो लिखना चाहू तो यह आर्टिकल काफी लम्बा हो जाएगा। इसलिए मैं रेलवेन्ट बातों को ही साझा करूंगा।
उसने मुझे बताया कि वो लड़का जो उसे छोड़ने आया था वो उसका बॉय फ्रेंड है। लड़का बंगाली है और उसके क्लास में ही पढता है। उसने यह बात अपने घर में किसी को नहीं बतायी है हालांकि वो उससे ही शादी करना चाहती है। मेरे ये पूछने पर कि उसने यह बात अपने घर में क्यूं नहीं बताया है, उसने बोला कि घर में यह बात मालूम होने पर उसकी पढ़ाई छुड़ा कर घर में बिठा देंगे। वह राजपूत है और राजपूतों में दूसरे जाति में शादी करने की सोचते भी नहीं, प्रेम विवाह तो उसके खानदान में बहुत दूर की बात है। उसने यह भी बताया कि उसके खानदान में वो पहली लड़की है जो बाहर जाकर अकेले रह कर इंजीनियरिंग कर रही है।
मित्रों, मैंने अक्सर देखा है ऐसे केसेज में जहाँ जहाँ लड़के लडकियां अपने कॉलेज में प्रेम तो कर लेते हैं, माँ-बाप की नजरों से बच कर काफी नजदीकी सम्बन्ध भी बना लेते हैं किन्तु परस्थितियाँ दोनों को जुदा कर देती हैं। कभी जाती-पाती तो कभी स्टेटस और कभी गोत्र। खैर मैंने उस लड़की को जिस तरह उस लड़के के साथ चिपके देखा था ट्रेन में उस भीड़ के बीच, यह तो समझ आ गया था कि वो उसके बहुत क्लोज आ चुकी थी, मैंने उसको समझाया कि वह प्यार की सीमा को समझे और समय का इंतज़ार करे। जब वो दोनों जॉब में आ कर सेटल हो जाएँ तभी घर वालों को बताएं और शादी के बारे में सोचें। इस बीच हर घंटे वो अपने प्रेमी को फ़ोन करके उसका हाल चाल ले रही थी। उसके पापा का भी बीच बीच में फ़ोन आता था कि उसकी ट्रेन किस स्टेशन तक पहुंची। उसके पापा उसी रात अपने पर्सनल कार में उसको पटना से महराजगंज ले जाने वाले थे।
खैर मेरा सफर तो इस तरह गुजर गया मगर इस दौरान मुझे बहुत कुछ देखने और समझने को मिला। आशा है मेरा यह लेखन आपको पसंद आया होगा जिसमे मैंने कुछ ऐसे प्रश्न चित्रित करने कि कोशिश की है जिनका निराकरण अभी बाकी है। एक परिवर्तन का दौर है - पुरानी और नयी सोच का एक टकराव है। बदलते दौर की मांग के अनुसार माता-पिता को भी बदलने की जरूरत है, समाज को बदलने की जरूरत है और हां युवाओं को भी धैर्य रखने की जरूरत है, सही और गलत में फर्क करने की जरूरत है वरना अच्छी खासी हसती खेलती ज़िन्दगी बर्बाद होने में देर नहीं लगती। जय हिन्द मित्रों !
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