Friday, January 31, 2014

विधवा होना क्या सचमुच एक अभिशाप है ? आज के युवा की नयी सोच क्या यह तस्वीर बदलेगी?

"जियो तो ऐसे जियो जैसे सब तुम्हारा है, मरो तो ऐसे मरो जैसे तुम्हारा कुछ भी नहीं। "
मित्रों, पिछले कई रातों से मैं एक पुरानी मूवी "बहु-बेटी" देखना चाहता था।   न जाने इस पुरानी मूवी में ऐसा क्या था जिसकी कशिश मुझे अपनी और खीच रही थी।   वैसे मुझे पुरानी ब्लैक एंड वाइट मूवीज का शौक पहले से ही है।   अशोक कुमार, माला सिन्हा, जॉय मुखर्जी, महमूद एवं मुमताज़ जैसे दिग्गज कलाकारों के द्वारा अभिनीत यह मूवी १९६५ में रिलीज़ हुई थी।   यह वह दौर था जब आजादी के पश्चात समाज में फैले अंधविश्वासों और परंपरा के नाम पर चल रहे अनेक कुरीतियों के खिलाफ भारत वर्ष में कई आंदोलन बुलंद हो रहे थे।  नौजवानों के मन में आजादी के बरसों के संघर्ष के बाद राष्ट्र निर्माण की बड़ी चुनौती हिलोरें ले रही थी। अंग्रेज़ों के साथ संघर्ष के उपरान्त नौजवानो की अगली मंज़िल थी सामाज में फैली बुराइओं को दूर करने की।   उस दौर में बाल विवाह का चलन काफी ज्यादा था।  विधवा विवाह को तब समाज में बहुत बुरी नज़र से देखा जाता था।

यह मूवी विधवा विवाह की पृष्टभूमि में ही बनी थी।   यह एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसकी शादी करीब १६ वर्ष की आयु में एक फौजी लड़के से कर दी जाती है।  उस जमाने में लड़की की उसकी शादी के वक़्त उसकी मर्ज़ी शायद ही पूछी जाती थी।   लड़की को एक गाय के सामान माना जाता था जिसे जिस भी खूटे से बाँध दिया जाता था, वह उसी खूटे के साथ हमेशा हमेशा के लिए बंध जाती थी।  लड़की के पिता के द्वारा लड़की के कन्यादान करने के बाद, उसके पिता का सारा अधिकार उस पर से खत्म हो जाता था  और यह सारे अधिकार लड़की के ससुराल वालों को मिल जाते थे।   चाहे ससुराल में वह जिस भी परिस्थिति में हो, उसकी अर्थी उठने तक उसे हर हाल में उसी घर में रहना होता था।   सास- ससुर, पति और उसके परिवार के अन्य लोगों का ख्याल रखना उसका परम कर्त्तव्य था।   देश की आधी आबादी से ज्यादा अशिक्षित थी।  और उस दौर में लड़कियों का शिक्षित होना बहुत बड़ी बात थी।   समाज को बुरी तरह से जकड़े अंधविश्वासों और परंपरागत ओछी मान्यताओं के पीछे का सबसे बड़ा कारण भी यह अशिक्षा ही थी।

मूवी के कहानी के अनुसार शादी के तुरत बाद सुहागरात के दिन ही उस फौजी लड़के को उसकी यूनिट द्वारा रात को टेलीग्राम दे कर किसी अपरिहार्य कारणवश उसकी छुट्टियां रद्द करते हुए उसे ड्यूटी पर तुरंत रिपोर्ट करने का निर्देश दिया जाता है।  अपनी नयी नवेली दुल्हन को अपने घर छोड़ वह अपने ड्यूटी के लिए रवाना हो जाता है।  फिर ड्यूटी पर उसकी शादी के तुरंत बाद भी देश सेवा के लिए उसकी कर्त्तव्यपरायणता से खुश हो कर उसे १५ दिन की छुटटी दी जाती है।   मगर किस्मत के बेरहम हाथ, उसके अपने घर लौटते वक़्त उसकी मोटर साइकिल का एक्सीडेंट होता है और वहीं उसकी मौत हो जाती है।   मौत की खबर पाते ही लड़के के माँ बाप के ऊपर एक पहाड़ टूट पड़ता है।   बहु विधवा हो जाती है और परंपरा के अनुसार एक दिन भी अपने पति के साथ सुहागरात तक न मना पाने वाली एक १६ वर्षीय लड़की को सफ़ेद साडी में लिपटा कर उसे सारी उम्र एक बंजर सी जिंदगी जीने पर मजबूर कर दिया जाता है।   उसके ससुर रिटायर्ड जज काफी सुलझे हुए एवं सामाजिक सुधारों के पक्षधर थे।  उन्हें इतने कम उम्र की बच्ची का इस तरह से जीवन जीना मंज़ूर न हुआ।   उन्होंने उसकी जीवन में खुशियों के प्रवेश के लिए उसे आगे पढ़ाने का निर्णय लिया।  कॉलेज में उसके एक सहपाठी पुरुष को उसके विधवा होने की जानकारी होने के बावजूद भी उससे प्रेम हो जाता है और वह उससे शादी करना चाहता है।  लड़के की सोच और उसकी अच्छाई उसे प्रभावित करती है।  उसे ऐसा लगता है कि वह उस लड़के के साथ काफी खुश रहेगी किन्तु परंपरागत सोच, रीति - रिवाजों और समाज के दबाव की वजह से इस प्रस्ताव को वह अपने दिल से पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाती है।  बुजुर्ग सास - ससुर की सेवा वह अपना परम कर्त्तव्य मानती है और वह इसके लिए अपने मन में उठे प्रेम का गला घोटने को तैयार हो जाती है।  उसके ससुर को इस बात की खबर होने के बाद की वो दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं, मगर उनके इज्जत की वजह से और उसके शादी के बाद उसके सास ससुर के अकेले हो जाने के डर से वह शादी नहीं करना चाहती, वह समाज की इस कुरीति से पंगा लेने का ठान लेते हैं।   चौतरफा विरोध के बावजूद, जिस विरोध में लड़की की सास और लड़की के पिता भी शामिल हो जाते हैं, जज साहब पीछे नहीं हटते और तमाम विरोधों के बावजूद दोनों की शादी मंदिर में करवाते हैं।

मित्रों, तब के दौर में और आज के दौर में यद्यपि काफी अंतर आ गया है, मगर आज भी विधवाओं का जीवन अनेक कष्ट से भरा है।   भले ही आज विधवाओं को उस तरह के कष्ट और कठोर जीवन के दौर से नहीं गुजरना पड़ता, फिर भी कम उम्र में विधवा हुई लडकियां समाज में तिरस्कार, बुरी नज़र  व एक लम्बी नीरस जीवन जीने को मज़बूर हैं।  शिक्षा के प्रसार के साथ उनकी सोच में थोडा परिवर्तन जरूर आया है।   किन्तु जरूरत है आज के युवाओं को आगे बढ़ कर ऐसी युवतियों का हाथ थामने की और उन्हें जीवन की नयी शुरआत करने का अवसर प्रदान करने की।   विधवा विवाह आज भी हमारे समाज में इतना कॉमन नहीं है।  अभी भी कई लोग ऐसा मानते हैं कि पति के मौत के पीछे पत्नी का बुरा भाग्य होता है।   और अगर उस लड़की का विवाह किसी अन्य लड़के से हुआ तो उस लड़के का भी वही अंज़ाम होगा।   ऐसे अंधविश्वास को तोड़ कर आज के युवाओं को समाज में एक नयी चेतना की जागृति करनी है।   यदि आप अपने देश और समाज के लिए कुछ अच्छा करना चाहते हैं तो आप खुद इस अच्छे काम के सहभागी बन सकते हैं।   ऐसी न जाने कितनी लडकियां एक अच्छे जीवनसाथी के तलाश में अखबारों और इंटरनेट साइट्स पर वैवाहिक विज्ञापन 'विधवा' कॉलम में देती हैं।   आप अगर शादी की योग्यता रखते हैं तो आप ऐसी किसी एक लड़की के ज़िन्दगी की रौशनी बन कर समाज में एक एक्जाम्पल पेश कर सकते हैं।

--------------------------------------------------------------------
मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे।

Tuesday, January 28, 2014

अखबार - हमारे जीवन का एक अटूट हिस्सा, मानते हैं आप?

मित्रों, हम सब में से काफी लोगों की एक कॉमन आदत होती है, सुबह का अखबार पढ़ना।   और सुबह सुबह हम अखबार के हमारे दरवाजे तक पहुँचने का बहुत बेसब्री से इंतज़ार करते हैं।  हम सबके पास पेपर पहुचाने वाला वेंडर सुबह अखबार हमारे घरों या फलैटों में फेंक कर या दरवाजे के नीचे से डाल कर चला जाता है।  जिस किसी दिन वह अखबार देने में लेट हो जाए, हम बेचैन हो उठते हैं।  यह अखबार बांटने वाले न जाने कितनी सुबह उठ अपनी बाइसिकल उठा कर अखबार लेने पहुचते हैं और फिर उसको अपनी साइकिल पर रख कर मीलों तक लोगों को घर घर अखबार की डिलीवरी करते हैं।  चाहे जाड़ा  हो, गर्मी हो या तेज बारिश, उनके रोज की दिनचर्या यही होती है।   

अखबार वालों को छुट्टिया कम ही मिलती हैं, हफ्ते के सातों दिन उन्हें अखबार छापना होता है।  हमने सामान्यतः देखा है, उनके लिए गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर दो दिन छुट्टिया फिक्स होती हैं और शायद साल में उन्हें इन दो दिनों के अलावा एक या दो दिन और छुट्टियां मिलती हैं।   अखबारों में काम करने वालो के लिए उनका काम कितना मुश्किल होता है, हम इसी बात से महसूस कर सकते हैं।  रात जब हम अपने घरों में चैन की नींद सोते हैं, अखबार वाले देर रात तक हमारे लिए अखबार छापने में लगे होते हैं ताकि हम सब को बिल्कुल ताज़ी खबर सुबह पढ़ने को मिले।  हमने अक्सर लोगों के द्वारा अखबार और मीडिया वालों को कोसते हुए देखा है, मगर सच्चाई ये है कि अगर एक दिन हमें सुबह अखबार न मिले तो पूरा दिन खाली खाली सा लगता है, कुछ खोया खोया सा महसूस होता है।  कई लोगों की तो सुबह शौच जाने से पहले अखबार पढ़ना जरूरी होता है वर्ना पेट पूरा खाली नहीं होता।  

सेवानिर्वृति के बाद अक्सर बुजुर्गों के पास जब कुछ ख़ास करने को नहीं रहता, उनके साथ टाइम बिताने को, बातें करने को कोई नहीं रहता- उस वक़्त उनका सबसे नजदीकि साथी अगर कोई होता है तो वह अखबार ही होता है।  अक्सर उन्हें दिन भर अखबार के एक एक पन्ने को और एक एक सेक्शन को उलट पलट कर पढ़ते हुए देखा जा सकता है।  टीवी न्यूज़ चैनल्स एवं इंटरनेट पर मौजूद पल पल के खबरों के अपडेट्स और उनकी पॉपुलरिटी के बावजूद आज भी प्रिंट मिडिया ख़ास कर अखबारों का महत्व कम नहीं हुआ है।  जहाँ एक तरफ टीवी पर मौजूद न्यूज़ चैनल्स एक ही ढर्रे पर सामान्यतः एक ही तरह के न्यूज़ जो अक्सर पॉलिटिक्स से सम्बंधित होते हैं, हर चैनल पर दिखाते हैं, वहीँ अखबारों में हमारे पास तरह तरह के समाचार होते हैं।   हर किसी को अपने अपने पसंद के हिसाब से उसमे उनके लिए अलग से कॉलम मिल जाते हैं, चाहे वो अखबार का पहला पेज हो या खेल का पेज हो, राजनीति का पेज हो, लोकल न्यूज़ का पेज हो या विदेश की खबर का पेज हो या फिर वाणिज्य या अर्थव्य्वस्था का पेज हो।  एक पेज जिसमे सम्पादक का कॉलम होता है ज्यादातर प्रबुद्ध लोगों को वो पेज बहुत पसंद होता है।   युवा वर्ग के लोगों व महिलाओं में पेज थ्री और अखबार के साथ रंगीन पन्नों में आने वाले सुप्प्लमेंटरी (मैग्ज़ीन) बहुत पसंद होती है।    

अखबार अक्सर अनजान लोगों के बीच दोस्ती या जान पहचान बनाने का भी काम करती है।  अक्सर ट्रेन या बसों में सफ़र करते वक़्त हम साथ बैठे यात्री से उसके हाथ का अखबार उनसे मांग कर पढ़ते हैं और इस तरह एक दूसरे से बात की शुरुआत भी होती है।  कई बार इसी के बहाने देश विदेश के कई मुद्दों पर आपस में चर्चा भी हो जाती है।  

अखबारों का अक्सर कई तरीके से प्रयोग किया जाता है।   अखबार के कई खबरों और उनमें निहित तस्वीरों को काट कर उसका एल्बम या फ़ाइल बनाने का भी कई लोगों को शौक होता है और इस तरह काफी यादगार इवेंट्स वे अपने दोस्तों के साथ शेयर करते हैं।  आप किसी भी दफ्तर में जाएँ, वहाँ रिसेप्शन या वेटिंग रूम में तिन चार तरह के अखबार मिल ही जायेंगे ताकि आप उस दौरान बोर न हों।   चाय नाश्ता के दुकानो से ले कर सलून तक हर जगह आपके लिए अखबार ही इंतज़ार के वक़्त का टाइम पास होता है।  आज भी लोकल जनरल स्टोर वाले अखबार के बनाये लिफ़ाफ़े में ग्राहकों को सामान पैक करके देते हैं।  गृहणियाँ अक्सर इंतज़ार करती हैं कि कब पुराने अखबार इकट्ठे हो जाएँ और रद्दी अखबार लेने वाला उनके घर आ कर उसे ले जाए, बदले में उन्हें जो कुछ पैसे वो देते हैं उससे वे काफी खुश होती हैं।   अखबार से न जाने कितने खिलोने और सजावट के सामान बनाये जाते हैं।  वास्तव में हम सबके लिए अखबार का महत्व इतना ज्यादा है कि उसके बिना हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते।  

मित्रों, यह विषय मैंने इस लिए चुना क्यूँ कि हम शायद ही कभी अखबार वालो को उनका क्रेडिट देते हैं।   हमलोगों को अखबार वालों के अथक प्रयास को जरूर सम्मान देना चाहिए और इससे जुड़े हर कर्मचारी चाहे वह डिलीवरी बॉय ही क्यूँ न हो उसके महत्व को समझना चाहिए।  एक बार मन से हम सब अखबार वालों का नमन करें ऐसी मेरी आशा है।  धन्यवाद !
--------------------------------------------------------------------
मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे। 

Saturday, January 25, 2014

नेशनल वोटर्स डे - एक मतदाता के रूप में प्रजातंत्र के प्रति हमारा दायित्व

आज नेशनल वोटर्स डे के अवसर पर कई अखबारों ने इस सम्बन्ध में वोटर्स को जागरूक करने हेतु आर्टिकल्स छापे हैं।  एक सर्वे के मुताबिक़ पुरे देश में १८-२९ वर्ष के उम्र के युवाओं में औसतन करीब ४१ प्रतिशत लोग मतदाता सूची से नदारद हैं, यानि कि इन लोगों ने अभी तक अपने आप को मतदान हेतु रजिस्टर्ड नहीं करवाया है।  शहरी क्षेत्रों में ख़ास कर महानगरों में तो स्थिति और भी बुरी दिखती है।  पुरे देश में ऐसे लोगों की संख्या करोड़ो में होगी।   जहाँ कि प्रत्याशियों की हार-जीत कई बार कुछ सौ वोटों से तय होती है, वही इतने बड़े पैमाने पर युवा मतदाताओं का रेजिस्टर्ड न होना अपने आप में एक अभिशाप है।   यह सरकारी एजेंसीज एवं चुनाव आयोग का फ़र्ज़ है कि भारत का हर नागरिक जो मतदान हेतु निर्धारित उम्र सीमा के अंतर्गत आता है उसका नाम मतदाता सूची में होना ही चाहिए।  

आज के युवाओं से बात करते हुए मैंने अक्सर उन्हें सरकार की नाकामियों पर कटाक्ष करते हुए देखा है।  आज की देश की बुरी स्थिति के लिए भी वो आज शाशन में बैठे राजनीतिक दलों को पूरी तरह जिम्मेवार ठहराते हैं।  मगर इनमे से कई युवा ऐसे हैं जिन्होंने आज तक कभी वोट नहीं किया और इसमें दोनों तरह के लोग हैं, यानि वो जिनके नाम मतदाता सूची में दर्ज है और वो भी जिनके नाम मतदाता सूची में दर्ज नहीं है।  मेरे ज्यादातर मित्र अपने शहर से बाहर दूसरे शहरों में नौकरी करते हैं और उनका मतदाता सूची में नाम उनके पैतृक निवास के पते पर होता है।  ऐसे में जरूरी है कि मतदान के वक़्त वे वहाँ मौजूद रह कर अपने मतदान का प्रयोग करें।  सरकारी नौकरी में होने पर, वोट डालने हेतु कार्मिकों को स्पेशल छुट्टी भी दी जाती है।  मगर कई बार हम लोग अपनी अकर्मण्यता के वजह से वोट डालने नहीं जाते।  ऐसे लोग जो किसी कारणवश मतदाता सूची से नदारद हैं, उनका अपनी तरफ से इस बात के लिए प्रयास शायद उतना नहीं होता।   मतदाता सूची में नाम डालने का कार्य सामान्यतः एक ख़ास वक़्त में कराया जाता है, जिस वक़्त अपनी पढ़ाई या जॉब की वजह से कई युवाओं के उनके पते पर मौजूद नहीं होने के कारण उनका नाम उस सूची में दर्ज नहीं हो पाता।  आज ही मुझे पता चला कि हम सब अपनी थोड़े से प्रयास से मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करवा सकते हैं।  जो पहले से मतदाता सूची में मौजूद हैं वे भी बड़ी आसानी से अपना नाम उस सूची में वेरीफाई कर सकते हैं।  इसके लिए आपको बस एक वेबसाइट पर जाना है और वो वेबसाइट है - eci.nic.in 

आप सभी युवाओं से अनुरोध है कि आप इस वेबसाइट पर जा कर अपना नाम वोटर सूची में है या नहीं यह वेरीफाई कर लें और यदि नहीं है तो यही से आप खुद को रजिस्टर भी करा सकते हैं।  आपका वोट प्रजातंत्र को मजबूत करने के लिए बहुत ज्यादा कीमती है और इस बात को हम सभी युवाओं को अच्छी तरह समझना है। धन्यवाद् मित्रों।  
--------------------------------------------------------------------
मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे। 

Friday, January 24, 2014

सेक्युलर बनाम कम्युनल का गन्दा खेल और जनता की बदलती सोच

१९९९ से लेकर आज तक भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं को अपनी पूरी ताकत के साथ कोसने वाले विभिन्न राजनीतिक दल हमेशा से ही एक कृत्रिम डर दिखा कर वोटों का ध्रुवीकरण करने में लगे हैं।  सेक्युलर बनाम कम्युनल का गन्दा खेल खेलने वाले ऐसे राजनीतिक दलों ने पिछले कई सालों से यही डर दिखा कर अल्पसंख्यकों को अपनी तरफ करने की भरपूर कोशिश की और उसमे बहुत हद तक सफल भी रहे हैं।  इस तरह भाजपा के खिलाफ लामबंद हो कर ये पार्टियाँ अनैतिक तरीके से सत्ता में एक दूसरे का सहयोग करती रही।  जनता की भलाई और देश के विकास को ताक पर रख कर इन पार्टियों ने जम कर भारत वर्ष के खजाने को लूटा।  पिछले दस वर्षों में देश की ऐसी दुर्दशा कर दी कि दुनिया के देशों के बीच हमारे देश की साख और सम्मान अब तक के न्यूनतम स्तर पर आ गयी है।  दुनिया के बड़े देशों के समूहों के सम्मेलनों में यह स्थिति साफ़ साफ़ परिलक्षित होती है।  यही देश जो श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में दुनिया के सबसे तेज विकास करने वाले अग्रणी देशो में से एक था।  चाहे अर्थ व्यवस्था का प्रश्न हो, जीडीपी के विकास दर की बात हो, शिक्षा, रोजगार, विज्ञान, तकनीकी, रक्षा, विदेश नीति, सामाजिक समरसत्ता की बात हो, हर तरफ चौतरफा विकास हो रहा था।  वहीँ आज की स्थिति बिल्कुल इससे उलट हमारे देश को एक कमजोर, विश्व में हर रैंकिंग में पिछड़ती, भ्रष्टाचार में पूरी तरह से डूबी, नकारात्मक विकास दिखाती अर्थव्यवस्था, महंगाई के चरमोत्कर्ष पर विराजमान राष्ट्र के रूप में प्रदर्शित करती है।  

एक बार फिर से ऐसे राजनीतिक दल वोटों की राजनीति के तहत अल्पसंख्यकों को अपनी तरफ वही पुराना डर दिखा कर अपनी तरफ करने की भरपूर कोशिश में लगे हैं।  भाजपा एवं उसके प्रधान मंत्री उम्मीदवार के खिलाफ जनता के समक्ष जहर उगल रहे हैं।   किन्तु जनता ने पिछले कई दशकों के इन दलों के छलावे को अच्छी तरह से समझते हुए इस बार इन दलों को सबक सिखाने का निर्णय लिया है।   टीवी चैनलों पर दिखाए जा रहे ओपिनियन पोल्स भी यही दिखा रहे हैं।   भाजपा से मोदी विरोध के चक्कर में अपना गठबंधन तोड़ने वाले नितीश कुमार जी का सूपड़ा बिहार से साफ़ होने जा रहा है।  भाजपा वहाँ बाकी हिंदी भाषी राज्यों की तरह ही एक आंधी की तरह ज्यादातर सीटों पर अपनी जीत दर्ज करवाने जा रही है।  मोदी जी के खिलाफ जितना ही ये दल विरोध के स्वर तेज करते हैं, झूठा प्रॆचार करते हैं, अल्पसंख्यकों को बेवजह डर दिखाते हैं, मोदी जी की जनता के बीच समर्थन और स्वीकार्यता उतनी ही बढ़ती है।   समझ नहीं आ रहा इन राजनीतिक दलों को यह सब क्यूँ नहीं दिख रहा कि उनके इन्हीं करतूतों के वजह से आज भारतवर्ष की अधिकाँश जनता पूरी तरह मोदी जी के साथ है।   मुझे तो लगता है कि दक्षिण और पूर्वी भारत में भी इस बार मोदी की लोकप्रियता के वजह से कई सीट आ सकती हैं।   बस आप विभिन्न राजनीतिक दल मोदी का विरोध करते रहिए और मोदी की जीत सुनश्चित करते जाइये।  धन्यवाद मित्रों।

--------------------------------------------------------------------
मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे। 

Monday, January 20, 2014

क्या आप सफल हैं ?

Author - Manoj Kumar Abhimanyu

मित्रों, जब कभी इतिहास के पन्नें पलटने का मौका मिलता है, मैंने अक्सर देखा है कि ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जिन्होंने अपनी अधेड़ आयु में भी अपने महान कार्यों से अपने देश को और अपने समाज तथा मानवता को काफी गौरान्वित किया है।  आप इस सन्दर्भ में कई नाम ले सकते हैं जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल, पंजाब केसरी लाला लाजपत राय, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन, महान समाज सेवी मदर टेरेसा,  पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादूर शास्त्री, पूर्व दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला इत्यादि।  आज के दौर में भी बर्मा की महान नेत्री आंग सां सु की, समाज सेवी अन्ना हज़ारे, रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन इत्यादि को हम उसी श्रेणी में रख सकते हैं।   मेरे इन नामों को यहाँ लेने का एक ख़ास मकसद है जिसका जिक्र मैं नीचे ज़रूर करूंगा।  फिलहाल मैं यह कहना चाहता हूँ कि यह सब तो ऐसे नाम हैं जिन्हे पूरा विश्व जानता और पहचानता है।  मगर ऐसे न जाने कितने लोग हैं जिन्होंने अपने उम्र के मध्यांतर के उपरांत भी ऐसे ऐसे महान कृत्य करके दिखाएं हैं जिनकी बदौलत न सिर्फ उन्होंने अपने समाज का सर ऊंचा किया है अपितु हज़ारों लोगों में प्रेरणा का स्त्रोत भी पैदा किया है।  ऐसे लोगों में धर्मं गुरु, राजनीतिज्ञ, समाजसेवी, कलाकार, वैज्ञानिक, उद्योगपति न जाने कितने श्रेणी के लोग हैं।

मित्रों, जब हम कभी सफलता की बात करते हैं, अक्सर हमारे सामने जो तस्वीर नजर आती है, वह यह है कि हम बचपन में स्कूल जाते हैं, बड़े होने पर कॉलेज और यूनिवर्सिटी और उसके बाद नौकरी या व्यवसाय करने लग जाते हैं।  अगर उम्र के २५ से ३० वर्ष के अंदर हमने अच्छी नौकरी या अच्छा व्यवसाय कर लिया तो अपने माता पिता, पास पड़ोस, मित्र, सहपाठियों एवं रिश्तेदारों की नज़रों में हम सफल हो गए।   फिर एक ही ढर्रे पर हमारी ज़िन्दगी चलती चली जाती है, और अपनी ज़िन्दगी में हम इस प्रकार उलझ कर रह जाते हैं कि हमें फिर किसी अन्य बातों जैसे देश एवं समाज में हो रहे परिवर्तन का वाहक बनने का मौका ही नहीं मिलता।   हम सब बस एक दूसरे से समाज में फैली बुराइयों को, सरकार में बैठे भ्रस्ट नेताओं और बेईमान नौकरशाहों को कोस कर अपने मन की भंडास निकाल लेते हैं।   और जब कभी इन बुराइयों का विरोध करने का मौका होता है, तो हम अक्सर ऐसे काम दूसरों के कन्धों पर डाल कर खुद चैन की नींद सोना चाहते हैं।   कई बार तो हम उन्ही भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को अपने काम के सुगम तरीके से होने के लिए खुद भी जाने अनजाने उसका साथ ही नहीं देते, बल्कि उनके सामने उनकी तारीफों के पूल बांधना और उनकी जी हज़ूरी करने से भी हम नहीं चूकते। यह हकीकत कड़वी जरूर है मगर उतनी ही सच्ची भी है।

तो मैं कह रहा था कि अगर हम ३० वर्ष की आयु तक अच्छी तरह नौकरी या व्यवसाय में सफल न हुए तो उपरोक्त सारे लोग हमें असफल मान लेते हैं।  दूसरों का हमारी तरफ रवैया देख कर हमारा खुद का विश्वास भी धरासायी हो जाता है और उनकी तरह हम भी अपने आप को असफल मान कर नकारात्मक मानसिकता से ग्रस्त हो आगे कुछ करने की हिम्मत खो बैठते हैं।   मगर कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो जीवन के आखरी पड़ाव तक भी हार नहीं मानते हैं, संघर्ष उनके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी होती है।   बार बार असफल हो कर भी, वो फिर से गिर कर खड़े होते हैं, अपना निश्चय दुगनी शक्ति से लगाते हुए आगे बढ़ते हैं और फिर एक दिन ऐसा आता है जब दुनिया के हज़ारो लाखों लोग उनकी सफलता का गुणगान करते नहीं थकते।   मित्रों मैं आप सब लोगों से कहना चाहता हूँ की जीवन सिर्फ खाने पीने, मित्रों के साथ टाइम पास करने, अपने परिवार के साथ मनोरंजन करने का ही नाम नहीं है।   यही फर्क होता है ऐसे सफल लोगों में जिन्हे तमाम लोग जानते पहचानते हैं और जिनके लिए हम सबके मन में श्रद्धा के भाव अनायास ही उमड़ पड़ते हैं, और हम जैसे आम लोगों में।

मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है जिनके पास अपार बौध्दिक क्षमता है जिसका प्रयोग करके वे मानवता कि अकूत सेवा कर अपार स्नेह और सच्ची सफलता के पात्र बन सकते हैं, परन्तु आम लोगों की तरह स्थायित्व की तलाश में वे एक जगह एक पेशे से बंध कर अपनी योग्यता को कोई खास दिशा नहीं दे पाते।   मैं ऐसे अपने तमाम मित्रों व पाठको से कहना चाहता हूँ कि हम सब को मानव शरीर मिला है, हम सब अकूत संभावनाओ के ढेर पर बैठे हैं।    इस जीवन को जीने का दो तरीका है।  पहला तो यह कि हम सब आम आदमी की तरह बस अपने तथाकथित सफलता को ही असली सफलता मान कर खुद को उन लाखों करोडो की भीड़ का हिस्सा मान लें और दूसरों की ही तरह बस सारे बुरे सिस्टम्स को, समाज में फैली बुराइयों को जी भर कर कोसते रहे, या फिर हम दूसरी श्रेणी में आने की कोशिश करें जिसमे आने की हिम्मत बहुत कम लोग जुटा पाते हैं, जहाँ संघर्ष तो जरूर है मगर साथ ही साथ जूनून है परिवर्तन का वाहक बनने का, समाज को एक नयी दिशा देने का, और अपनी एक ऐसी पहचान बनाने का जो दशको तक याद की जाती रहेगी।   सफलता दरअसल इसी का नाम है मित्रों।   आप किसी भी उम्र के हों, आप इस संघर्ष में अपना योगदान कर सकते हैं, अपने देश के लिए, अपने समाज के लिए, मानवता के लिए, अच्छाई के लिए।   आप अगर चालीस या पचास की उम्र पार कर गए हों, कभी ये न सोचें की आप अब अपने उम्र के मध्यांतर तक पहुच चुके हैं और अब आप क्या कर सकते हैं ?  आपके सामने ऐसे पचासो चेहरे नज़र आयेंगे जो आपसे कहीं ज्यादा उम्र के होते हुए भी  संघर्ष करते दीखते हैं, वो अपनी ज़िन्दगी में काफी सफल हैं, वो चाहें तो आम लोगों की तरह सब कुछ छोड़ कर आराम की ज़िन्दगी गुजर बसर कर सकते हैं , मगर वे ऐसा नहीं करते क्यूँ कि उसी से उनकी पहचान है, उनकी असली ज़िन्दगी, उनके सफलता का राज भी वही है।

मित्रों मैं करीब चार दिनों के अंतराल के बाद कुछ लिख रहा हूँ, अपने शहर से दूर किसी काम से दूसरी जगह गया था, मगर इन दिनों आप सबसे अपने मन की बात साझा न कर पाने का एक दर्द भी था। शायद उन सब दिनों का कसर आज के इस लेख में मैंने उतारने की छोटी सी कोशिश है जो यदि आप सबों को पसंद आये तो दिल खोल कर अपने लाइक्स मुझे मेरे ब्लॉग में जरूर दीजियेगा , धन्यवाद !

--------------------------------------------------------------------
मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे। 

Sunday, January 12, 2014

ठंढ का मौसम - हमारा और गरीबों का (संस्मरण)

Author- Manoj Kumar Abhimanyu

रविवार की छुट्टी के वजह से आज मैं थोडा देर से उठा।  करीब आठ बज गए थे।  अनुमन मैं सुबह के सात बजे तक उठता हूँ।  देर रात तक पठन -पाठन की वजह से अक्सर सोने में देर हो जाती है, इसलिए सुबह और जल्दी उठ पाना सम्भव नहीं हो पाता।  सुबह घर की साफ़ सफाई करने के बाद अभी बाथरूम के अंदर गया ही था कि किसी ने बाहर से कॉल बेल बजाया।   देखा एक वृद्द व्यक्ति जो लगभग हर दो तीन महीने पर मेरे यहाँ आ कर मेरे पुराने अखबार खरीद कर ले जाते हैं, सामने खड़े हैं।   उनको पिछले ५ - ६ वर्षों से लगातार देख रहा हूँ।  पहले बड़े स्वस्थ और भले चंगे दीखते थे।  मगर बीच में उनके स्वास्थ्य में मैंने बड़ी तेज गिरावट देखी थी, उनके आंखों में चश्मा आ गया था, शरीर दुबला हो गया था।  और उस वक़्त भी उनको अपने कंधे पर बोझ उठा कर घर घर घूमते हुए देख कर मन बहुत ज्यादा व्याकुल हो उठा था।  मैंने जब उनसे उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा था तो उन्होंने बस इतना ही कहा था की उन्हें मधुमेह का रोग हो गया है और इसी वजह से उनके शरीर में उतनी ताकत नहीं रही।   उन्होंने कहा की फिर भी जीने के लिए काम करना तो जरूरी है।

फिर कुछ महीनो बाद जब उन्हें देखा तो पहले से थोडा बेहतर दिखे।   गर्मियों में वह एक हाफ स्लीव की सफ़ेद बनयान और एक लुंगी पहन कर कंधे पर एक बड़ा सा झोला ले कर घर घर जाते हैं।   आज जब ठण्ड में उन्हें देखा तो किसी तरह वह अपने शरीर के ऊपरी भाग को ठीक ठाक ढक कर आये थे मगर नीचे वही लूंगी पहना हुआ था।   वह जब कभी आते हैं मेरे घर, मेरा हाल चाल पूछते हैं, कहते हैं बाबू कैसे हैं आप?   मैं हर बार की तरह उनसे कहता हूँ कि मैं ठीक हूँ और फिर उन्हें अखबार दिखा देता हूँ और वो बस ५ मिनट के अंदर पूरा अखबार तोल  कर अपने लूंगी की गाँठ से कुछ रुपये निकाल कर मुझे दे जाते हैं।   शायद वो भी जल्दी में रहते हैं और मैं भी अपने ऑफिस जाने की जल्दी में, अगर वह दिन छुट्टी का दिन नहीं हुआ तो।   आज उन्होंने मुझे गरम कपडे पहने देखा तो जाते जाते मुझसे पूछ बैठे, बाबू आपके पास ऐसा ही कोई पुराना गरम कपडा पड़ा हो..  उन्होंने बस इतना ही कहा था कि ऐसा लगा मानो जो बात मैं उनसे संकोच वश कभी नहीं पूछता था, उन्होंने आज खुद से ही वो बात मुझसे कह डाली।   मैंने कहा हां मेरे पास तो जरूर पड़े होंगे मैं अभी देता हूँ आपको।  मैंने एक गरम टी-शर्ट निकाल कर उनको दिया फिर मैंने सोचा कि उनको फुल ट्राउज़र की ज्यादा जरूरत है, मैंने उनसे पूछा कि उनको चाहिए, उन्होंने बहुत खुश हो कर कहा कि हां बाबू , मैं गरीब आदमी हूँ, गरम कपडे खऱीद कर नहीं पहन सकता आप बाबू लोगों के पास बहुत पड़े होते हैं जो पुराने हो गए हों, उनमे से मुझे एक दे दीजिये।  बड़ी ख़ुशी से मैंने एक ब्लैक कलर का स्लीपिंग सूट का ट्राउज़र उनको दिया।  वो भी काफी खुश हुए और अपने झोले में रख कर उसे ले गए।

आज अन्य दिनों कि अपेक्षा ठण्ड कुछ ज्यादा ही है यहाँ कलकत्ते में भी।   गरीब लोगों की बेबसी देख कर जी कुम्हला जाता है।   यही जाड़े का मौसम जो मेरे जैसे लोगों के लिए बहुत आनंद प्रदान करने वाला है, गरीबों को कितना कष्ट पहुंचाती है।   मैंने कई बार अपने कपडे, जूते, अन्न , मिठाइयां अपने आस पास के काम करने वालों में बाटें  हैं और यह करके मुझे बहुत ख़ुशी होती है।  यह कोई परोपकार का बिषय नहीं है क्यूँ कि इसमें मेरा कुछ खर्च नहीं होता।  न ही मैं अपने नए कपडे या कोई ऐसी चीज़ें बाटता हूँ।   मुझे लगता है कि जो चीजें हमारे घर में रह कर बेकार पड़ी होती हैं, और जिनका प्रयोग हम नहीं करते अगर उन वस्तुओं को हम जरूरतमंद और गरीब लोगों में बाँट सकें तो, वही चीज़ उनके कितने काम आ सकती है।   मगर मन में इच्छा होते हुए भी संकोचवश हम कभी उनसे यह न तो कह पाते हैं, ना उनकी मदद कर पाते हैं।   गरीब लोग बड़े स्वाभिमानी होते हैं, मगर जरा सी हमारी पहल उनके लिए बहुत मददगार साबित हो सकती है।  मित्रों मेरा यह संस्मरण लिखने का मकसद सिर्फ यही है कि ठण्ड, बारिश जैसे मौसम में अगर हम अपनी ऐसी चीज़ों से दूसरों की मदद कर सकें तो यह न सिर्फ उन गरीबो के काम आएगा, बल्कि हमें भी आत्मीय सुख का अनुभव होगा।   धन्यवाद।
--------------------------------------------------------------------
मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे।

Tuesday, January 7, 2014

क्या आप हमारे राजनीतिज्ञों कि उनकी गुणवत्ता के आधार पर रेटिंग चाहेंगे ?

Author- Manoj Kumar Abhimanyu

मित्रों, कुछ समय पहले तक टीवी में अक्सर 'भारत निर्माण' का विज्ञापन आता था।  यह विज्ञापन देख कर मेरे अंतर्मन में दुःख, निराशा और गुस्से के भाव पैदा होते थे।  इसी तरह की भावना सारे देश भक्तों के अंदर आती होगी, ऐसा मेरा मानना है।  आज़ादी के लगभग सात दशकों के उपरांत भी हमारे देश ने वह प्रगति नहीं कि है जो दूसरे देश, जिन्हे हमारे बाद आज़ादी मिली, उन देशों ने करके दिखाया है।   आज भी हम आज़ादी के वक़्त जिन प्रश्नो का जवाब तलाश कर रहे थे, उन्हीं का जवाब ढूंढने में लगे हैं।  शिक्षा, बिजली, पानी, सड़क, भूख, गरीबी, बीमारी, बेरोजगारी, रहने को घर,रूढ़िवादिता, टुकड़ो टुकड़ो में बटा हमारा समाज, लाल फीताशाही, भाई भतीजावाद, भ्रस्टाचार, बेईमानी, बेलगाम बढ़ती जनसंख्या और महंगाई जैसे न जाने कितने सवाल अभी भी हमारे सामने मुँह बाये खड़े हैं।  यह कैसी बिडम्बना है कि युएनओ के सर्वे के आधार पर विश्व के समस्त देशों के बीच हमारा देश मानव विकास इंडेक्स में आखिरी पायदान के कुछ देशों के साथ खड़ा है।  हमारे देश कि बागडोर जिन हाथों में कई दशकों तक रही, उन नेताओं ने बेईमान पूंजीपतियों और अपराधी तत्वों के साथ सांठ गाठ करके देश के विकास और जनता कि भलाई से ज्यादा खुद कि सम्पदा बढ़ाने पर इतना ज्यादा ध्यान दिया कि गरीबी और अमीरी के बीच कि खाई बढ़ती चली गयी।   यही नहीं देश में फूट 'डालो और राज करो' के अंग्रेज़ों के सिद्धांत पर चलते हुए इन लोगों ने समाज को इस तरह विभाजित किया कि आज लोगों के बीच भाईचारे, प्रेम और विश्वास कि भारी कमी है।  जनता को इस तरह बाँट कर इन नेताओ ने उन्हें निरंतर वोट बैंक कि तरह इस्तेमाल किया है।   हर चुनावी वादे में गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी को दूर करने के वादे किये जाते हैं और जीत जाने पर सारे मुद्दे गौण हो जाते हैं।

ऐसे नेताओं को ठीक करने का मेरा एक सुझाव है कि जिस प्रकार फिल्मों कि रेटिंग होती है, या टीवी पर आने वाले प्रोग्राम्स की रेटिंग होती है जिसे टी आर पी  भी कहते हैं, जो इन फिल्मों या सीरियलों कि गुणात्मकता को प्रदर्शित करता है, क्यूँ न हम ऐसी ही रेटिंग अपने नेताओं की भी करें।   उनके पूर्व कार्य काल में किये अच्छे या बुरे कार्यों तथा उनकी बाकी योग्यताओं के आधार पर उनको -१० से +१० के बीच पॉइंट्स दिए जाएँ।   और इस कार्य को करने के लिए विश्वशनीय रेटिंग एजेंसीयों को प्रयोग किया जाए।

मित्रों, मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आपको मेरा लेखन अच्छा लगेगा।   कृपया अपना आशीर्वाद और लाइक्स मुझे इसी तरह देते रहिये ताकि मेरा हौसला बुलंद रहे और मैं नित प्रति दिन अपने पाठकों के लिए लिखता रहूँ।  आप सबों को मेरे पोस्ट्स पसंद करने के लिए फिर से बहुत बहुत धन्यवाद।
--------------------------------------------------------------------
मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे।

Sunday, January 5, 2014

तेरी आँखों में बसा एक सपना हूँ मैं


Written by- Manoj Kumar Abhimanyu

तेरी आँखों में बसा एक सपना हूँ मैं
ढूंढती नज़र तेरी यहाँ वहाँ जैसे तुझसे तनहा हूँ मैं।

करीब आती हो जब कभी मुझे पहचानती नहीं
सूरत मेरी शायद तुझे कभी रास आती नहीं।

एक बार दिल के झरोखे से पहचान मेरी हकीकत को
सूरत ही नहीं ज़ालिम देख मेरी सिरत को।

दूर जाती मुझसे दिल को अक्सर ठोकरें दिए जाती हो।
क्यूँ इतना तन्हाइयों में खुद को तड़पाये जाती हो।
-------------------------------------------------------
--------------------------------------------------------------------
मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे।

Saturday, January 4, 2014

एक बार खुल कर जीना चाहता हूँ

Written by- Manoj Kumar Abhimanyu

एक बार खुल कर जीना चाहता हूँ
इस बेरंग ज़िन्दगी में रंग बिखेरना चाहता हूँ।

बरसों ने दिया मुझे तन्हाई की सौगात
खुशियों कि तलाश में गिनता रहा दिन रात!

सोचा था मिल जायेगा साथ किसी हमसफ़र का
छट जाएगा घना अँधेरा तब मेरी ज़िन्दगी का।

दिल के घावों पर मरहम खुद ही लगाना होता है
इंतज़ार के अनगिनत पलों को खुद ही में सिमेटना होता है।

न जाने कितनी बार दिया मुझे इस दिल ने धोखा
हर बार लेकिन मैं बेरंग खाली हाथ ही लौटा।

उम्मीदों का दामन छोड़ना कभी सिखा ही नहीं
खुशियो को गले लगाना कभी आया भी नहीं।

अंतहीन गहरी नींद में जाने से पहले
एक बार खुल कर जीना चाहता हूँ
इस बेरंग ज़िन्दगी में रंग बिखेरना चाहता हूँ।

--------------------------------------------------------------------
मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे।

एक और निर्भया - दिल दहला देने वाली एक और घटना जो हमारे समाज के ऊपर एक और तमाचा है!

Author- Manoj Kumar Abhimanyu

पिछले एक हफ्ते से मेरी आत्मा बार बार मेरे सर्वस्व को झकजोर रही है।  समझ नहीं आ रहा क्या करूं !  आप सबको तो दिल्ली में हुआ निर्भया रेप काण्ड तो याद ही होगा।  याद भी क्यूँ न हो, आखिर पुरे देश में इसको ले कर आंदोलन हुआ था।   मीडिया ने इस समाचार को हाथो हाथ लिया था।  ऐसा लगा था मानो जनता के जागरूक होने से सरकार और कानून व्यवस्था कायम रखने वाली सारी एजेंसियां पूरी तरह जागृत हो गयी हैं।   और इस जागृति के बाद शायद इस तरह कि घटनाओ पर लगाम लगेगा।   मगर हकीकत कुछ और ही बयां करती है।   अभी भी रेप के घटनाएं बदस्तूर जारी हैं।  आये दिन अखबारो में पढता हूँ कि बड़े बड़े शहरों एवं महानगरों में बुजुर्ग महिलाओ से ले कर अबोध मासूम बच्चियों तक पर रेप हो रहे हैं।  हद तो यह हो गयी है कि रेप करने के बाद भी अपराधी न केवल बेख़ौफ़ घूमते हैं, बल्कि उन रेप कि शिकार महिलाओ, बच्चियों एवं उनके परिवार वालों का कत्ल करने कि धमकी से ले कर कभी कभी तो उनका दुबारा या नियमित तौर से रेप करने से भी नहीं चूकते।   और हमारा वही सभ्य समाज जो निर्भया के लिए अचानक जागृत हो कर सड़को पर कैंडल मार्च से ले कर सरकार एवं पुलिस के निकम्मेपन को ले कर अत्यंत आंदोलित हो गया था, वो आज फिर से अपनी पुरानी कुम्भकर्णी नींद के आगोश में वापस चला गया मालूम होता है।

जी हाँ मात्र सोलह साल कि लड़की, जिसके टैक्सी चालक पिता जो कि कोलकाता में पिछले करीब २५ वर्ष से वहाँ कि सड़को पर टैक्सी चला कर अपनी और अपने परिवार के सदस्यो का भरण पोषण करते आये हैं, को दरिंदो ने न केवल एक बार गैंग रेप किया बल्कि लड़की के द्वारा अपने पिता को यह बात बताने पर जब वो पुलिस के पास पहुचे तो पुलिस वालों ने केस रजिस्टर करने से भी इंकार कर दिया।  और यह बात जब उन दरिंदो को पता चली कि वह लड़की पुलिस के पास केस दर्ज कराने गयी थी, तो उन दरिंदो ने उसके साथ दुबारा रेप किया और जान से मारने कि धमकी भी दी। आये दिन डर और आतंक के माहौल ने हालत यह कर दी कि उसके पिता को अपना पुराना महल्ला छोड़ कर दूसरी जगह किराये पे कमरा लेना पड़ा।  ऐसी दरिंदगी को वह कम उम्र लड़की सहन न कर सकी और जब उसे यह मालूम हुआ कि वो गर्भवती हो गयी है तो उसने अपनी जीवन लीला खत्म करने के लिए अपने ऊपर केरोसिन डाल कर आत्मा हत्या करने कि कोशिश की जिसमे वह आग से बहुत बुरी तरह झुलस गयी।   करीब एक हफ्ते अस्पताल के बेड  पर ज़िन्दगी और मौत के बीच झूलने के बाद उसने दम तोड़ दिया।   उस छोटी सी बच्ची को क्या मालूम था कि पिछले १५ - १६ सालो तक अपने पैतृक गाँव जो कि बिहार में स्थित है वहाँ रह कर पढ़ने लिखने के बाद जब उसके पिता उसे व उसकी माँ को कोलकाता ले कर आयेंगे ताकि उसकी परवरिश कोलकाता में बेहतर हो सके, उसकी शिक्षा बेहतर स्कूल में हो सके, तब उसके कोलकाता आने के कुछ दिनों के अंदर ही उसके साथ ऐसी दरिंदगी होगी।  आज उस पिता पर क्या गुजरती होगी, मैं तो यह सोच सोच कर पागल हो रहा हुँ।  मगर यहाँ कि सरकार को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा।  सरकार का कोई नुमाइंदा उनके हाल चाल पूछने को नहीं गया, ना किसी ने कोई सान्तवना दी।  हालत तो यह थी कि जब उसके परिवार वाले मुख्य मंत्री से मिलने गए तो उन्हें वहा से भगा दिया गया।   दर्द और आतंक के साये में जी रही उस लड़की ने तो अपनी जान देकर उस नारकीय जीवन से मुक्ति पा ली।  अभी उसके पिता पर धमकियों का दौर जारी है और उन पर दवाब बनाया जा रहा है कि वो अपनी बेटी का केस वापिस ले कर कोलकाता छोड़ कर वापिस बिहार चले जाएँ।  क्या हमारा दिल इतना पत्थर दिल हो गया है कि इस बात से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, अगर नहीं तो रोज यह खबर अखबारो में आती है, वो आंदोलन का दिया जो निर्भया से शुरू हुआ था क्या वो आवाज़ हर ऐसी दरिन्दिगी के खिलाफ, समाज के इन बेखौफ घूमते अपराधियो के खिलाफ और पुलिस और सत्ता में बैठे भ्रष्ट लोगो के खिलाफ जो ऐसे अपराधियो के साथ सांठ गाँठ करके बैठे हैं, उनके खिलाफ फिर से नहीं जलेगा?  मैंने आप सबको जगाने का प्रयास किया है, मैं देखना चाहता हूँ कि मेरे मित्रो में से कितने आज इस बात पर मेरे साथ एक मत हैं?  कितनो कि आत्मा ऐसी दरिंदगी पर उनको झकझोरती है ?

--------------------------------------------------------------------
मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे।

Friday, January 3, 2014

My observations on an article suggesting stress control measures by Indian women written by our beloved writer, Chetan Bhagat

Author- Manoj Kumar Abhimanyu

Let me first share his article that came in Times of India in the month of December in First section and then in the Second section you will have my observation-

Section - I
-----------
Alright, this is not cool at all. A recent survey by Nielsen has revealed that Indian women are the most stressed out in the world: 87% of our women feel stressed out most of the time. This statistic alone has caused me to stress out. Even in workaholic America, only 53% women feel stressed.
What are we doing to our women? I'm biased, but Indian women are the most beautiful in the world. As mothers, sisters, daughters, colleagues, wives and girlfriends - we love them. Can you imagine life without the ladies?

For now, I want to give Indian women five suggestions to reduce their stress levels.

One, don't ever think you are without power. Give it back to that mother-in-law. Be who you are, not someone she wished you would be. She doesn't like you? That's her problem.

Two, if you are doing a good job at work and your boss doesn't value you -tell him that, or quit. Talented, hard-working people are much in demand.

Three, educate yourself, learn skills, network - figure out ways to be economically independent. So next time your husband tells you that you are not a good enough wife, mother or daughter-in-law, you can tell him to take a hike.

Four, do not ever feel stressed about having a dual responsibility of family and work. It is difficult, but not impossible. The trick is not to expect an A+ in every aspect of your life. You are not taking an exam, and you frankly can't score cent per cent (unless you are in SRCC, of course). It is okay if you don't make four dishes for lunch, one can fill their stomach with one. It is okay if you don't work until midnight and don't get a promotion. Nobody remembers their job designation on their dying day.

Five, most important, don't get competitive with other women. Someone will make a better scrapbook for her school project than you. Another will lose more weight with a better diet. Your neighbor may make a six-dabba tiffin for her husband, you don't - big deal. Do your best, but don't keep looking out for the report card, and definitely don't expect to top the class. There is no ideal woman in this world, and if you strive to become one, there will be only one thing you will achieve for certain - stress.

So breathe, chill, relax. Tell yourself you are beautiful, do your best and deserve a peaceful life. Anybody trying to take that away from you is making a mistake, not you. Your purpose of coming to this earth is not to please everyone. Your purpose is to offer what you have to the world, and have a good life in return. The next time this survey comes, i don't want to see Indian women on top of the list. I want them to be the happiest women in the world. 

Cherish Womanhood!!

Satisfaction is always Better than Success. Because Success is measured by others, but Satisfaction is measured by own Heart..!!

---------------------------------------
Section II - My observations –
---------------------------------------
 This article as usual seems to be very informative and well expressed by our beloved writer, Chetan Bhagat ji. He writes fluently in very simple, easy to understand common men’s words.  I have always got inspired by him. But agreeing with many of his points here, I beg to differ on one aspect where he has mentioned that "give it back to the mother-in-law". In fact this sentence is crudely used to identify and categorise the old aged mother-in-laws as cruel ladies who often mishandle their daughter-in-laws. Media and daily soap operas (Saas Bahu Serials) have already enough fueled such a general conception among the people. 

I don't deny that such mishandling or cruelty happen in our society by the mother-in-laws on their daughter-in-laws, but if 4 or 5 ladies do that out of 100, you can't blame squarely mother-in-laws as a class that torture their daughter-in-laws. To the contrary, the facts suggest something else that does not get media attention because that does not sell.  We are talking about a woman who is weaker, who cross the age of fifty till their sons get married, who is mostly suffering with old age diseases, who is often ignored by their husbands and sons due to other priorities and their busy lives with not much time to spare for her.  In such a case, how can she torture her far younger, physically fit, energetic, more educated and independent daughter-in-laws who are comparatively from more liberal and smarter generation, and to whom today the Indian laws have also armored with several weapons to use on their in-laws in case of any disputes arising within the family? That too when we mostly live in nuclear families where at most we have our families consisting of wife, husband, children and their parents with no extended family living with us under one roof.  

Further these old mother-in-laws have little voice as compared to their daughter-in-laws in the family and elsewhere.  An old lady's cry and torment in the hands of her daughter-in-laws is hardly heard in India and is often ignored by the society. I think it's a very sensitive issue, we often forget that these mothers have given us birth and because of them we exist, and they deserve the maximum respect from us all in their old and weaker stage of life. After all today’s daughter-in-laws are tomorrow’s mother-in-laws too.  Are we really giving that respect to them?  Let us ask this question to our own hearts. Chetan Bhagat ji, I sincerely differ from you on this point. I too have modern thoughts and do not subscribe to old age hippocratic views but due to some instances that happen in the society mostly in backward areas where girls are married in their young age, all mother-in-laws should not be branded like this.  Leaving aside this aspect your article is really good and worthy of admiration as I have already mentioned in the first para of this observation.

--------------------------------------------------------------------
मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे। 

India in 2050 : on course of becoming an economic superpower and alleviating poverty

Day before yesterday I was discussing with my friends how despite so much of progress we have failed to provide the living standard to maj...