Author - Manoj Kumar Abhimanyu
मित्रों, जब कभी इतिहास के पन्नें पलटने का मौका मिलता है, मैंने अक्सर देखा है कि ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जिन्होंने अपनी अधेड़ आयु में भी अपने महान कार्यों से अपने देश को और अपने समाज तथा मानवता को काफी गौरान्वित किया है। आप इस सन्दर्भ में कई नाम ले सकते हैं जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल, पंजाब केसरी लाला लाजपत राय, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन, महान समाज सेवी मदर टेरेसा, पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादूर शास्त्री, पूर्व दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला इत्यादि। आज के दौर में भी बर्मा की महान नेत्री आंग सां सु की, समाज सेवी अन्ना हज़ारे, रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन इत्यादि को हम उसी श्रेणी में रख सकते हैं। मेरे इन नामों को यहाँ लेने का एक ख़ास मकसद है जिसका जिक्र मैं नीचे ज़रूर करूंगा। फिलहाल मैं यह कहना चाहता हूँ कि यह सब तो ऐसे नाम हैं जिन्हे पूरा विश्व जानता और पहचानता है। मगर ऐसे न जाने कितने लोग हैं जिन्होंने अपने उम्र के मध्यांतर के उपरांत भी ऐसे ऐसे महान कृत्य करके दिखाएं हैं जिनकी बदौलत न सिर्फ उन्होंने अपने समाज का सर ऊंचा किया है अपितु हज़ारों लोगों में प्रेरणा का स्त्रोत भी पैदा किया है। ऐसे लोगों में धर्मं गुरु, राजनीतिज्ञ, समाजसेवी, कलाकार, वैज्ञानिक, उद्योगपति न जाने कितने श्रेणी के लोग हैं।
मित्रों, जब हम कभी सफलता की बात करते हैं, अक्सर हमारे सामने जो तस्वीर नजर आती है, वह यह है कि हम बचपन में स्कूल जाते हैं, बड़े होने पर कॉलेज और यूनिवर्सिटी और उसके बाद नौकरी या व्यवसाय करने लग जाते हैं। अगर उम्र के २५ से ३० वर्ष के अंदर हमने अच्छी नौकरी या अच्छा व्यवसाय कर लिया तो अपने माता पिता, पास पड़ोस, मित्र, सहपाठियों एवं रिश्तेदारों की नज़रों में हम सफल हो गए। फिर एक ही ढर्रे पर हमारी ज़िन्दगी चलती चली जाती है, और अपनी ज़िन्दगी में हम इस प्रकार उलझ कर रह जाते हैं कि हमें फिर किसी अन्य बातों जैसे देश एवं समाज में हो रहे परिवर्तन का वाहक बनने का मौका ही नहीं मिलता। हम सब बस एक दूसरे से समाज में फैली बुराइयों को, सरकार में बैठे भ्रस्ट नेताओं और बेईमान नौकरशाहों को कोस कर अपने मन की भंडास निकाल लेते हैं। और जब कभी इन बुराइयों का विरोध करने का मौका होता है, तो हम अक्सर ऐसे काम दूसरों के कन्धों पर डाल कर खुद चैन की नींद सोना चाहते हैं। कई बार तो हम उन्ही भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को अपने काम के सुगम तरीके से होने के लिए खुद भी जाने अनजाने उसका साथ ही नहीं देते, बल्कि उनके सामने उनकी तारीफों के पूल बांधना और उनकी जी हज़ूरी करने से भी हम नहीं चूकते। यह हकीकत कड़वी जरूर है मगर उतनी ही सच्ची भी है।
तो मैं कह रहा था कि अगर हम ३० वर्ष की आयु तक अच्छी तरह नौकरी या व्यवसाय में सफल न हुए तो उपरोक्त सारे लोग हमें असफल मान लेते हैं। दूसरों का हमारी तरफ रवैया देख कर हमारा खुद का विश्वास भी धरासायी हो जाता है और उनकी तरह हम भी अपने आप को असफल मान कर नकारात्मक मानसिकता से ग्रस्त हो आगे कुछ करने की हिम्मत खो बैठते हैं। मगर कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो जीवन के आखरी पड़ाव तक भी हार नहीं मानते हैं, संघर्ष उनके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी होती है। बार बार असफल हो कर भी, वो फिर से गिर कर खड़े होते हैं, अपना निश्चय दुगनी शक्ति से लगाते हुए आगे बढ़ते हैं और फिर एक दिन ऐसा आता है जब दुनिया के हज़ारो लाखों लोग उनकी सफलता का गुणगान करते नहीं थकते। मित्रों मैं आप सब लोगों से कहना चाहता हूँ की जीवन सिर्फ खाने पीने, मित्रों के साथ टाइम पास करने, अपने परिवार के साथ मनोरंजन करने का ही नाम नहीं है। यही फर्क होता है ऐसे सफल लोगों में जिन्हे तमाम लोग जानते पहचानते हैं और जिनके लिए हम सबके मन में श्रद्धा के भाव अनायास ही उमड़ पड़ते हैं, और हम जैसे आम लोगों में।
मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है जिनके पास अपार बौध्दिक क्षमता है जिसका प्रयोग करके वे मानवता कि अकूत सेवा कर अपार स्नेह और सच्ची सफलता के पात्र बन सकते हैं, परन्तु आम लोगों की तरह स्थायित्व की तलाश में वे एक जगह एक पेशे से बंध कर अपनी योग्यता को कोई खास दिशा नहीं दे पाते। मैं ऐसे अपने तमाम मित्रों व पाठको से कहना चाहता हूँ कि हम सब को मानव शरीर मिला है, हम सब अकूत संभावनाओ के ढेर पर बैठे हैं। इस जीवन को जीने का दो तरीका है। पहला तो यह कि हम सब आम आदमी की तरह बस अपने तथाकथित सफलता को ही असली सफलता मान कर खुद को उन लाखों करोडो की भीड़ का हिस्सा मान लें और दूसरों की ही तरह बस सारे बुरे सिस्टम्स को, समाज में फैली बुराइयों को जी भर कर कोसते रहे, या फिर हम दूसरी श्रेणी में आने की कोशिश करें जिसमे आने की हिम्मत बहुत कम लोग जुटा पाते हैं, जहाँ संघर्ष तो जरूर है मगर साथ ही साथ जूनून है परिवर्तन का वाहक बनने का, समाज को एक नयी दिशा देने का, और अपनी एक ऐसी पहचान बनाने का जो दशको तक याद की जाती रहेगी। सफलता दरअसल इसी का नाम है मित्रों। आप किसी भी उम्र के हों, आप इस संघर्ष में अपना योगदान कर सकते हैं, अपने देश के लिए, अपने समाज के लिए, मानवता के लिए, अच्छाई के लिए। आप अगर चालीस या पचास की उम्र पार कर गए हों, कभी ये न सोचें की आप अब अपने उम्र के मध्यांतर तक पहुच चुके हैं और अब आप क्या कर सकते हैं ? आपके सामने ऐसे पचासो चेहरे नज़र आयेंगे जो आपसे कहीं ज्यादा उम्र के होते हुए भी संघर्ष करते दीखते हैं, वो अपनी ज़िन्दगी में काफी सफल हैं, वो चाहें तो आम लोगों की तरह सब कुछ छोड़ कर आराम की ज़िन्दगी गुजर बसर कर सकते हैं , मगर वे ऐसा नहीं करते क्यूँ कि उसी से उनकी पहचान है, उनकी असली ज़िन्दगी, उनके सफलता का राज भी वही है।
मित्रों मैं करीब चार दिनों के अंतराल के बाद कुछ लिख रहा हूँ, अपने शहर से दूर किसी काम से दूसरी जगह गया था, मगर इन दिनों आप सबसे अपने मन की बात साझा न कर पाने का एक दर्द भी था। शायद उन सब दिनों का कसर आज के इस लेख में मैंने उतारने की छोटी सी कोशिश है जो यदि आप सबों को पसंद आये तो दिल खोल कर अपने लाइक्स मुझे मेरे ब्लॉग में जरूर दीजियेगा , धन्यवाद !
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