Sunday, January 12, 2014

ठंढ का मौसम - हमारा और गरीबों का (संस्मरण)

Author- Manoj Kumar Abhimanyu

रविवार की छुट्टी के वजह से आज मैं थोडा देर से उठा।  करीब आठ बज गए थे।  अनुमन मैं सुबह के सात बजे तक उठता हूँ।  देर रात तक पठन -पाठन की वजह से अक्सर सोने में देर हो जाती है, इसलिए सुबह और जल्दी उठ पाना सम्भव नहीं हो पाता।  सुबह घर की साफ़ सफाई करने के बाद अभी बाथरूम के अंदर गया ही था कि किसी ने बाहर से कॉल बेल बजाया।   देखा एक वृद्द व्यक्ति जो लगभग हर दो तीन महीने पर मेरे यहाँ आ कर मेरे पुराने अखबार खरीद कर ले जाते हैं, सामने खड़े हैं।   उनको पिछले ५ - ६ वर्षों से लगातार देख रहा हूँ।  पहले बड़े स्वस्थ और भले चंगे दीखते थे।  मगर बीच में उनके स्वास्थ्य में मैंने बड़ी तेज गिरावट देखी थी, उनके आंखों में चश्मा आ गया था, शरीर दुबला हो गया था।  और उस वक़्त भी उनको अपने कंधे पर बोझ उठा कर घर घर घूमते हुए देख कर मन बहुत ज्यादा व्याकुल हो उठा था।  मैंने जब उनसे उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा था तो उन्होंने बस इतना ही कहा था की उन्हें मधुमेह का रोग हो गया है और इसी वजह से उनके शरीर में उतनी ताकत नहीं रही।   उन्होंने कहा की फिर भी जीने के लिए काम करना तो जरूरी है।

फिर कुछ महीनो बाद जब उन्हें देखा तो पहले से थोडा बेहतर दिखे।   गर्मियों में वह एक हाफ स्लीव की सफ़ेद बनयान और एक लुंगी पहन कर कंधे पर एक बड़ा सा झोला ले कर घर घर जाते हैं।   आज जब ठण्ड में उन्हें देखा तो किसी तरह वह अपने शरीर के ऊपरी भाग को ठीक ठाक ढक कर आये थे मगर नीचे वही लूंगी पहना हुआ था।   वह जब कभी आते हैं मेरे घर, मेरा हाल चाल पूछते हैं, कहते हैं बाबू कैसे हैं आप?   मैं हर बार की तरह उनसे कहता हूँ कि मैं ठीक हूँ और फिर उन्हें अखबार दिखा देता हूँ और वो बस ५ मिनट के अंदर पूरा अखबार तोल  कर अपने लूंगी की गाँठ से कुछ रुपये निकाल कर मुझे दे जाते हैं।   शायद वो भी जल्दी में रहते हैं और मैं भी अपने ऑफिस जाने की जल्दी में, अगर वह दिन छुट्टी का दिन नहीं हुआ तो।   आज उन्होंने मुझे गरम कपडे पहने देखा तो जाते जाते मुझसे पूछ बैठे, बाबू आपके पास ऐसा ही कोई पुराना गरम कपडा पड़ा हो..  उन्होंने बस इतना ही कहा था कि ऐसा लगा मानो जो बात मैं उनसे संकोच वश कभी नहीं पूछता था, उन्होंने आज खुद से ही वो बात मुझसे कह डाली।   मैंने कहा हां मेरे पास तो जरूर पड़े होंगे मैं अभी देता हूँ आपको।  मैंने एक गरम टी-शर्ट निकाल कर उनको दिया फिर मैंने सोचा कि उनको फुल ट्राउज़र की ज्यादा जरूरत है, मैंने उनसे पूछा कि उनको चाहिए, उन्होंने बहुत खुश हो कर कहा कि हां बाबू , मैं गरीब आदमी हूँ, गरम कपडे खऱीद कर नहीं पहन सकता आप बाबू लोगों के पास बहुत पड़े होते हैं जो पुराने हो गए हों, उनमे से मुझे एक दे दीजिये।  बड़ी ख़ुशी से मैंने एक ब्लैक कलर का स्लीपिंग सूट का ट्राउज़र उनको दिया।  वो भी काफी खुश हुए और अपने झोले में रख कर उसे ले गए।

आज अन्य दिनों कि अपेक्षा ठण्ड कुछ ज्यादा ही है यहाँ कलकत्ते में भी।   गरीब लोगों की बेबसी देख कर जी कुम्हला जाता है।   यही जाड़े का मौसम जो मेरे जैसे लोगों के लिए बहुत आनंद प्रदान करने वाला है, गरीबों को कितना कष्ट पहुंचाती है।   मैंने कई बार अपने कपडे, जूते, अन्न , मिठाइयां अपने आस पास के काम करने वालों में बाटें  हैं और यह करके मुझे बहुत ख़ुशी होती है।  यह कोई परोपकार का बिषय नहीं है क्यूँ कि इसमें मेरा कुछ खर्च नहीं होता।  न ही मैं अपने नए कपडे या कोई ऐसी चीज़ें बाटता हूँ।   मुझे लगता है कि जो चीजें हमारे घर में रह कर बेकार पड़ी होती हैं, और जिनका प्रयोग हम नहीं करते अगर उन वस्तुओं को हम जरूरतमंद और गरीब लोगों में बाँट सकें तो, वही चीज़ उनके कितने काम आ सकती है।   मगर मन में इच्छा होते हुए भी संकोचवश हम कभी उनसे यह न तो कह पाते हैं, ना उनकी मदद कर पाते हैं।   गरीब लोग बड़े स्वाभिमानी होते हैं, मगर जरा सी हमारी पहल उनके लिए बहुत मददगार साबित हो सकती है।  मित्रों मेरा यह संस्मरण लिखने का मकसद सिर्फ यही है कि ठण्ड, बारिश जैसे मौसम में अगर हम अपनी ऐसी चीज़ों से दूसरों की मदद कर सकें तो यह न सिर्फ उन गरीबो के काम आएगा, बल्कि हमें भी आत्मीय सुख का अनुभव होगा।   धन्यवाद।
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