आज मेरे एक महिला सहकर्मी ने मुझे मेरे फेसबुक के टाइम लाइन पर पूछा कि आप भाजपा एवं उसके मुखिया मोदी जी के तारीफों के पूल बांधते थकते नहीं, आज जब उन्होंने रेल किराये में १४ प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी है तो इसके ऊपर कुछ क्यों नहीं लिखते। मित्रों, मोदी जी के प्रधान मंत्री बनने के बाद कोई राजनीतिक टिप्पणी मैंने काफी कम की है। वैसे महंगाई बढ़ना किसे पसंद है ? किन्तु महंगाई का बढ़ना और उसका अनियंत्रित होना इन दो स्थितियों में बहुत फर्क होता है। हमारी पिछली सरकार ने महंगाई को अनियंत्रित कर दिया था। महंगाई को नियंत्रित करने के जो ठोस उपाय पिछले दस वर्षो तक राज कर चुकी हमारी पिछली सरकार को करना चाहिये था, उसने नहीं किया। हाथ पर हाथ धरी बैठी मौनी बाबा की वह सरकार हमारे देश को कई दशक पीछे धकेल गयी। ना सिर्फ इस सरकार ने हमारे सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर को कई दशकों के निचले स्तर तक पहुंचा दिया, साथ ही भ्रस्टाचार के नित नए कृतिमान भी स्थापित किये। जिसकी वजह से हमारा देश अप्रत्याशित अवांछित कर्ज की बोझ तले बुरी तरह दब चुका है। पिछली सरकार के शाशन में देश के खजाने को बुरी तरह लूट लेने के बाद और अर्थव्यवस्था को पूरी तरह खोखला एवं अपंग बना देने के बाद, हमारे देश की नयी सरकार के सामने देश अर्थव्यवस्था को पटरी पर वापस लाने की बहुत बड़ी चुनौती है।
मित्रों, हम सब भाग्यशाली हैं की आज हमारे देश की बागडोर एक कर्मयोगी एवं देश भक्त के हाथों सुरक्षित है। हमें विश्वास है की मोदी जी न सिर्फ हमारे देश को इन विषम परिस्थितियों से बाहर निकालेंगे, बल्कि हमारे देश को सफलता की नयी बुलंदियों तक पहुचाएंगे। मगर इस बात को करने में काफी वक़्त लगेगा, यह हम सब को समझना होगा। ये सब करना इतना आसान नहीं है , ये कोई जादू की छड़ी नहीं है कि छड़ी घुमाई और सब कुछ अच्छा हो गया। देश बहुत बड़ा है, आबादी बहुत बड़ी है। सबको साथ ले कर चलना है, सबकी विकास करनी है। इसमें कृषि क्षेत्र है, औद्योगिक क्षेत्र है, स्वास्थय है, बिजली, सड़क, पानी है। लोगों को सबल बनाना है मोदी जी का मुख्य उद्देश्य। यानी कि हर कोई इस काबिल हो सके कि उसे किसी सब्सिडी की, किसी अनुदान की जरूरत ही न पड़े। ना कोई निर्बल हो, ना कोई भूखा हो, ना कोई नंगा हो, ना कोई अपाहिज हो। उनकी सोच है कि आज हमें एक ऐसे राष्ट्र के रूप में विकसित होना है जिसकी पहचान उसकी सबल, जागरूक और स्वाबलंबी जनता हो।
जहाँ तक रेलवे किराए में एवं माल ढुलाई में बढ़ोतरी की बात है, मुझे जहाँ तक लगता है कि हम इस बात का विरोध सिर्फ इस लिए करते हैं क्यों कि यह मामला रेल से जुड़ा है। मित्रों, हम ऐसा क्यों सोचते हैं कि रेलवे किराया न बढाए? रेलवे एक संस्था है जो प्रत्यक्षतः लाखों हिन्दुस्तानियो को नौकरी प्रदान करता है तथा अप्रतयक्ष रूप से करोडो लोगों को रोजगार प्रदान करता है। रेलवे विभाग का विशालकाय स्वरुप हमारे देश को विश्व का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क होने का गौरव प्रदान करता है। किन्तु इसे संचालित करना रेलवे प्रबंधन के लिए बहुत ही कठिन कार्य है। सभी प्रकार के इनपुट कॉस्ट जैसे स्टील, ईंधन, वेतन इत्यादि के कॉस्ट में वृद्धि के साथ अगर किराए में वृद्धि न की जाए तो रेल विभाग की भी वही स्थिति हो जायेगी जैसी की हाल के वर्षों में एयर इंडिया की हो गयी है। एयर इंडिया की तो लगभग दिवालिया होने जैसी नौबत आ गयी है। कई महीनो के वेतन कर्मचारियों के बकाये हैं। कितने ही कर्मचारियों को काम से निकाल दिया गया है। क्या हम चाहते हैं कि रेलवे की स्थिति भी ऐसी हो जाए ? नहीं ना, फिर हमें इस बात को समझना होगा कि अगर हम साबुन, तेल, दवा, खाने की वस्तुओं पर ज्यादा पैसे खर्च कर सकते हैं। ऑटो और टैक्सी के बढे हुए किराए को देने के लिए तैयार रहते हैं। सिनेमा के टिकटों पर कई गुने वृद्धि हो जाने पर भी उसका विरोध नहीं करते। रेस्टोरेंट में खाना खाने और महंगे होटलों में रात बिताने पर और होटल में बैरों को टिप देने में गुरेज नहीं करते तो फिर रेल किराए में बढ़ोतरी पर इतना हो हल्ला क्यों करते हैं ? मैं मानता हूँ कि रेल यात्रा सबके लिए महंगे हो गए हैं, किन्तु आज भी रेल यात्रा बाकी के आवागमन के माध्यमों से काफी सस्ता है। शायद उन लोगों को जो एयर कंडीशन कोचों में सफर करते हैं, उनको यह १४ प्रतिशत की बढ़ोतरी ज्यादा लग रही होगी क्यूंकि उनकी किरायों में अत्यधिक वृद्धि है। यह तो एक तरह से अच्छा ही है कि गरीबों की अपेक्षा जो ज्यादा पैसे खर्च करने में सक्षम हैं, उनके ऊपर किराए का बोझ ज्यादा पड़े।
मेरी इस नयी सरकार से यही अपेक्षा है कि उनके किये गए वादों के अनुसार जितनी जल्दी हो सके, प्राइवेट पार्टनरशिप में रेलवे का काया-कल्प करें और यात्रियों के लिए ज्यादा से ज्यादा सुरक्षा एवं सुविधा प्रदान की जाए। साथ ही माल ढुलाई के लिए अलग मार्ग एवं बुलेट ट्रैन की शुरुआत जैसे नए प्रस्तावों को जल्द से जल्द अमल में लाया जाए। इसके लिए शुरुआत में थोड़ी कड़वी दवा भी पीनी हो तो हम पीने को तैयार हैं बशर्ते कि सरकार की सार्थक प्रयास रंग लाने को तैयार हो।
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