Monday, June 23, 2014

यादों की कुछ धुंधली तस्वीर

(कल्पना पर आधारित, आज के युवाओं की सच्ची कहानियो से प्रेरित)
गुजरे हुए वो पल यादों की कुछ धुंधली तस्वीर बन कर रह गए हैं।   तुम्हारा वो मुझसे पहली बार मिलने आना, तब जब मैं तुम्हारे लिए एक अजनबी था।  फिर उस दिन हमारा शहर के सबसे लोकप्रिय जगह साइंस सिटी घूमने जाना और फिर उस दौरान एक दूसरे को जानने की कोशिश करना।  तुम्हारा मुझे उन सब चीजों की जानकारी देना जो मुझे पता न थीं।  तुम्हारे लिए वो एक चिर परिचित जगह थी।  तुम मुझे एक गाइड की तरह उस जगह के कोने कोने से वाकिफ करा रही थी। हमारा वो एक साथ प्लेनेटोरियम में शो देखना, फिर हमारा गगनचुम्बी झूले पर झूलना और वो तुम्हारी ऊंचाई से डर कर मेरा हाथ जोर से पकड़ कर बैठना।  तुम्हारा वो आँखें बंद कर मुझसे चिपक जाना, कितना प्यारा एहसास था वो सब।

उसके बाद से हर रोज दिन भर ना जाने कितनी बार एक दूसरे से फ़ोन पर बातें करना।   फिर कुछ ही दिनों में तुम्हारा मेरे घर आना मेरे घर के कोने कोने को मंत्र मुग्ध कर गयी।   ऐसा लगा जैसे बरसों से खाली उस घर में अचानक से बहार आ गई हो।   तुम्हारा तितलियों सा मेरे इर्द गिर्द घूमना।  तुम्हारी हर वो कोशिश जो सिर्फ इस लिए थी की मैं उस दिन को भरपूर जी सकूँ।  फिर शाम होते होते वापस जाने का वक़्त नजदीक आने पर तुम्हारा उदास हो जाना और उसी उदासी में तुम्हारे वो गीत जो मैं दूर खड़ा सुन रहा था और जिन्हे सुन कर मेरी आँखों में आंसू आ गए थे।   तुम्हे एहसास भी न था की मैं भावुक हो कर तुम्हारे ही पीछे खड़ा हो तुम्हारे वो दर्द भरे गीत सुन रहा था।  तुम अपनी धून में गाती जा रही थी शायद मुझे वे गाने समझ नहीं आ रहे थे मगर तुम्हारी दर्द भरी आवाज़ और तुम्हारे वो सुर मुझे तुम्हारी और बरबस खिचे चले जा रहे थे।  उस वक़्त शायद मैं यही चाहता था कि तुम्हे अपनी बाहों में भर लूँ , मगर ऐसा कर न सका, और फिर तुम चली गयी।

फिर तुम्हारे आने जाने का और हमारे मिलने का क्रम चलता रहा तब तक जब तक की तुम्हारी इंगेजमेंट कही और न हो गयी।   और फिर उस दिन मैं अपने दोस्तों के साथ फिर उसी जगह जहाँ हम पहली बार मिले थे, बुक फेयर देखने गया था।  करीब तीन वर्षों बाद।  वहां पहुंच कर तुम्हारी बहुत याद आ रही थी।   बार बार ऐसा लग रहा था कि काश वहीं कहीं तुम दीख जाती।   मेरे बाकी के दोस्त तो काफी एन्जॉय कर रहे थे, वही मैं अपनी पुरानी यादों में खोया हर चेहरे में तुम्हे ही ढूंढ रहा था।   फिर अचानक एक चेहरे पे नज़र पड़ी।   वही आँखें, वही चेहरा अचानक मेरे सामने से गुज़र कर आगे बढ़ गया।   एक पल को तो ये यकीं ही न हुआ कि वो तुम ही थी।   फिर दोस्तों को थोड़ी देर के लिए वेट करने को बोल कर थोड़ा नज़दीक से उसे देखने की कोशिश की।   वो एक लड़के के हाथ में हाथ डाले उससे बातें करती हुई जा रही थी, ठीक वैसे ही जैसे कभी हम एक दूसरे के साथ आत्मीयता के साथ घुमा करते थे।   यह देख कर मेरे पुरे शरीर में मानो बिजली का करंट दौड़ गया।   मैंने तुम्हारे मोबाइल पर कॉल किया, एक नहीं, मैंने तीन चार बार कॉल किया।   मगर तुमने रिंग जाने दिया।   तुमने उस वक़्त मेरा फ़ोन नहीं उठाया।   मैं परेशान अपने दोस्तों के पास वापस आ गया।   दोस्तों ने पूछा की मैं कहाँ चला गया था , फिर उन्हें पूरी बात बतायी।

अपने ख्यालों को भटकाने के लिए और थोड़ा एन्जॉय करने के लिए मैं जहाँ गया था वहां से ख्यालों का एक नया सिलसिला ले कर घर वापिस आया।   पता नहीं क्या क्या सोच रहा था मैं पूरी शाम।  फिर रात के करीब १० बजे मेरे फ़ोन की घंटी बजी।  मैंने फ़ोन उठाया और दूसरी और तुम थी।  मैं तुमसे बेतहासा सा पूछता गया था कि क्या तुम उस वक़्त बुक फेयर में थी। तुम्हारे हाँ कहने पर न जाने कितने प्रश्न पूछता चला गया। तुमने मुझसे सारी बातें बताईं थी।  तुमने यह भी बताया की ये वही लड़का था जिससे तुम्हारी इंगेजमेंट फिक्स हुई है।  तुम्हारी बातें सुन कर मेरा सारा गुस्सा मेरी मज़बूरी की शक्ल ले कर मेरे मन से बाहर निकल आया।   फिर तुमने अपने होने वाले पति के बारे में बताया कि वो कितने अच्छे हैं, काफी शर्मीले हैं और बहुत केयरिंग भी।  सब सुन कर अंदर से जलन भी हो रही थी।   मगर किस्मत की लकीरों ने मेरी कहानी में यही लिखा था।   फिर कुछ दिन तुम्हारे खट्टे मीठे अनुभवों को सुनता रहा फ़ोन पर।   मगर फिर शायद तुम्हे भी एहसास हो गया कि तुम्हारी वो बातें मेरे दिल को सुकून कम, और दर्द ज्यादा देते हैं।   फिर हमारा फ़ोन पर बातें रोज से हफ्ते दो हफ्ते में और अब तो महीनो में होती है।  और वो भी जब कभी तुम्हारा अपने मंगेतर से झगड़ा होता है या किसी वजह से तुम बहुत परेशान होती हो। क्या कहूँ तुम्हे, फिल्मों में या नोवेल्स के नायकों को अक्सर दिल टूट जाने पर अपने प्रेयसि को मन से ज़िन्दगी भर खुश और आबाद रहने में अपनी ख़ुशी को शामिल करते देखा है।   क्या मैं भी ऐसा कर पाउँगा ?

मित्रों, कभी कभी हम न चाहते हुए भी ज़िन्दगी के सफर में किसी स्टेशन पर मिले मुसाफिर की तरह एक दूसरे की यादें बन कर रह जाते हैं।

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