Tuesday, October 14, 2014

एक तेरा साथ हमको दो जहाँ से प्यारा है

अभी मोहम्मद रफ़ी साहब और लता मंगेशकर जी के गाये गीत 'एक तेरा साथ हमको दो जहाँ से प्यारा है' सुन रहा था।   मित्रों, यह गाना मेरे बचपन के सबसे प्रिय गानो में से एक है।   उस वक़्त ऑडियो कैसेट्स का दौर था।   मुझे याद है मैं घंटो कैसेट पारलर में खड़े हो कर मोहम्मद रफ़ी के गाने ढूंढता था।   एच एम वी  और ग्रामोफ़ोन कंपनी के कैसेट्स के पास ही ज्यादातर राइट्स हुआ करते थे ऐसे ओरिजिनल गानो के।   बस लालसा भरी नज़रों से देखा करता था, खरीदने के लिए जेब में पैसे तो होते नहीं थे।  किसी तरह पॉकेट मनी जो बचाई ज्यादातर ब्लेंक कैसेट्स ले कर गाने कॉपी करवा लेता था।  एच एम वी के ब्लेंक कैसेट्स में करीब १५ - १६ गाने कॉपी हो जाते थे।   फिर उनको दिन रात सुनना।   मुझ पर मोहम्मद रफ़ी साहब के गानो का जादुई प्रभाव है।   मेरे पास ऐसे दो सौ के आस पास कैसेट्स इकट्ठे हो गए होंगे।   मोहम्मद रफ़ी के बाद मेरे सबसे पसंदीदा गायक कलाकार थीं लता जी और आशा जी।  पुरुष गायकों में मुझे किशोर कुमार भी बहुत पसंद थे।  दूसरी तरफ मुझे याद है मुझे मुकेश के गाने बहुत ही कम पसंद थे।   पर ये मेरे बचपन की बात थी।   आज जब मुकेश को सुनता हूँ , ऐसा लगता है उनके जैसी परिपक्वता किसी भी गायक के आवाज़ में नहीं थी।   आज वही मुकेश मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।   

मित्रों, मैंने ऊपर जिस गाने का जिक्र किया है उसका वीडियो या यह फिल्म मैंने नहीं देखा था।   आज यू ट्यूब पर इस गाने को ढूंढा और फिर पुरानी यादें ताज़ा हो गयी।  आज इंटरनेट के सुलभ हो जाने तथा यू ट्यूब जैसे साइट्स के उपलब्ध होने के कारण हर  हार्ड डिस्क में सैकड़ो गाने उपलब्ध होते हैं जिनके लिए अलग से महंगे कैसेट्स या डी वी डी खरीदने की जरूरत नहीं होती।    इसी क्रम में आज जब इस गीत के ब्लैक और वाइट संस्करण को देखा, मन प्रसन्नचित्त हो उठा।   गाने के दोनों अभिनेता काफी प्यारे दिखते हैं।   मैं दोनों को शायद पहली बार देख रहा हूँ क्यूंकि यह बहुत ही पुरानी मूवी का गाना है और इससे पहले इसका वीडियो देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका।   

शादी के बाद की पहली रात जिसमे दो अनजान लोग जब साथ मिलते थे तो उनके दिलों में जो प्यार के मीठे मीठे सपने होते होंगे उसको जीवंत रूप देता यह गाना सच में यह सोचने पर मजबूर करता है कि उस दौर के लोग कितने शांत, सुशील और शर्मीले होते थे।   दोनों ही कलाकारों के चेहरे पर इनोसेंस देख कर मन मंत्रमुग्ध हो जाता है , वैसे भी यह गाना रात के सन्नाटे में अकेलेपन में सुनना एक अलौकिक एहसास कराता है।  मुझे हमेशा से ये महसूस होता आया है कि रफ़ी साहब और लता जी दोनों के जिह्वा पर माँ सरस्वती विराजमान होती थी तभी उस दौर में ऐसे दिव्य गाने बनते थे।   
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