Monday, February 10, 2014

युवाओं एवं किशोरों के दिल में वैलेंटाइन डे की दस्तक एक बार फिर

मैंने पिछले साल वैलेंटाइन डे के ऊपर अपने विचार लिखे थे।  इस बार फिर कुछ लिखने का मन हो रहा है।  अब टाइप करना स्टार्ट किया है तो कुछ लिखूंगा जरूर और मेरी कोशिश यही होगी कि आप सबको मेरा यह लेखन भी पसंद आये।   मात्र चार दिन रह गए हैं जब वैलेंटाइन डे एक बार फिर हम सबकी लाइफ में दस्तक देगा।   मुझे कुछ मित्रों ने आज पूछा कि इस वैलेंटाइन डे पर क्या प्लान है ?  खैर, मेरा प्लान तो मैं बाद में शेयर कर सकता हूँ।  मगर पहले मैं वैलेंटाइन डे की हमारे युवाओं के ऊपर प्रभाव का जिक्र करना चाहूंगा।

महानगरों में ही नहीं, वैलेंटाइन डे, फ्रेंड्स डे, रोज डे, चोक्लेट डे जैसे दिवसों ने अब छोटे शहरों को भी अपने प्रभाव में ले लिया है।   अतः हम इस सच्चाई से कतई मुँह नहीं मोड़ सकते कि हमारे किशोर एवं युवा लड़के और लडकियां इन दिवसों को किसी फेस्टिवल की तरह ही सेलिब्रेट करते हैं।  जब हम छोटे थे और स्कूल जाते थे तब इन दिवसों का इतना प्रभाव हमारे ऊपर नहीं था, हाँ तब भी हम न्यू इयर एक पर्व की तरह ही सेलिब्रेट करते थे।  आज के इन दिवसों के सेलिब्रेशन को युरोपीय संस्कृति से जोड़ कर शायद कुछ लोग देखते हों, किन्तु जिस तरह अंग्रेजी भाषा का देशी और भारतीय संस्करण जिसमें न जाने कितने तरह के एक्सेंट पाये जाते हैं जैसे, दक्षिण भारतीय एक्सेंट, बिहार और यु पी के लोगों का एक्सेंट, नॉर्थ ईस्ट के लोगों का एक्सेंट की भाँती ही, इन दिवसों का भी भारतीयकरण हो चूका है।   और हो भी क्यूँ ना ?  आज हम चाहे जितना भी यूरोप व अमेरिका जैसे देशों का विरोध करें, अपने बच्चों को अंग्रेजी या कान्वेंट स्कूलों में ही पढ़ाना चाहते हैं।   अंग्रेजी भले ही फर्राटेदार न बोलते हों, अपनी बोल चाल के भाषा में कम से कम ३० प्रतिशत अंग्रेजी के शब्द तो यूज करते ही हैं।  माता पिता अपने बच्चे के अंग्रेजी में भाषण देने, लेख लिखने, वाद विवाद प्रतियोगिता इत्यादि में उनके पुरूस्कार जितने पर अत्यंत गौरान्वित अनुभव करते हैं और इस बात को अपने हर मित्र और जानने वालो के साथ शेयर करते हैं।  आज माता पिता अपने बच्चों के लिए सपने देखते हैं कि बड़ा हो कर उनका लाड़ला या लाड़ली यूरोप या अमेरिका के किसी प्रतिष्ठीत यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करेगा और उनका नाम रोशन करेगा।

आज के अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले किशोर हिंदी या अपने रीजनल भाषा के फिल्मों के बजाये अंग्रेजी फिल्मों का बहुत ज्यादा शौक रखते हैं।  उनसे अगर आप हिंदी के फिल्मों का नाम पूछेंगे तो वो शायद उनका नाम भी न जानते हों।  हिंदी या रीजनल फिल्मों में काम करने वाले कुछ शीर्ष के अभिनेता व अभिनेत्रियों को छोड़ किसी का नाम भी उन्हें न मालूम हो किन्तु, अंग्रेजी के हर छोटे बड़े अभिनेता और अभिनेत्रियों के नाम के साथ साथ असंख्य अंग्रेजी फिल्मों के नाम और उनकी कहानी उन्हें मालूम होगी।  उनसे उनके मनपसंद किताब का नाम पूछ लीजिये, हर १० में से ८ लड़के लडकियां , विदेशी लेखकों के किताब का नाम लेंगे।  एक बच्चा जो ५ वर्ष की आयु से ही अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहा हो और जहाँ स्कूल में, अंग्रेजी शिक्षकों एवं सहपाठियों के साथ उसका काफी ज्यादा समय गुजरता हो, ऐसा होना तो स्वाभाविक ही है।

कभी कभी सोचता हूँ कि एक ऐसी संस्कृति जो मूलतः हमसे काफी भिन्न है कैसे ऐसे किशोरों एवं युवाओं को इतना प्रभावित करती है।   वे किस तरह अपने आप को विदेशी मानसिकता और परिवेश के समकक्ष पाते हैं ?  कभी कभी तो ऐसा लगता है यह सब एक दूसरे को दिखावा देने के लिए ही किया जाता है।   मॉडर्निटी के लिए एक अंधी दौड़ है जिसकी शुरुआत हो चुकी है।  किन्तु यह भी सच है कि हम अंग्रेज़ों तथा अमेरिकन और यूरोपियन लोगों से सर्वथा भिन्न हैं, जो उनके साथ उनके ही देश में रहने का मौका आने पर हमें खुद इस बात का एहसास हो जाता है कि वो हमें किस नज़र से देखते हैं और हमारे लिए उनके लाइफ स्टाइल को कॉपी करना कितना कठिन है।   खैर, अब तो ऐसा लगता है कि पश्चिमी सभ्यता से आयातित ऐसे दिवस अब हमारे देश का हिस्सा बन ही चुके हैं।   अतः अच्छा यही है कि हमारे बड़े-बुजुर्ग, माता- पिता एवं शिक्षक हमारे किशोरों एवं युवाओं के इन दिवसों के आकर्षण का विरोध न कर इन दिवसों को भारतीय लुक देने की कोशिश करें जिससे इन दिवसों से जुड़े साइड इफेक्ट्स को कम करने की कोशिश की जा सके।

मेरे कुछ युवा सहकर्मियों व मित्रों में इन दोनों मैं काफी उत्साह देख रहा हूँ।   इसमें दो तरह के लोग हैं, एक वो जो पहले से ही अपने पार्टनर के साथ प्रतिबद्ध हैं तो दूसरी तरफ ऐसे युवा जो अभी तक सिंगल हैं और किसी का अपने लाइफ में आने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं।   पर सभी खुश हैं , क्यूंकि एक मौका फिर आया है जब वे अपनी पसंद का इज़हार कर अपने सम्बन्ध को एक नया जोश एवं मजबूती प्रदान करेंगे जिनकी लाइफ में पहले से कोई पार्टनर है,  तथा दूसरे इस लिए खुश हैं क्यूँकि एक बार फिर उन्हें अपने पसंद को प्रोपोज करने का मौका मिलने वाला है।   किन्तु ऐसे मौकों पर कई युवाओं के दिल भी टूटते हैं जब उनका प्रयास विफल हो जाता है या मन में इच्छा के होते हुए भी कई बार युवा अपने मन की बात अपने पसंद पर जाहिर नहीं कर पाते।

जो भी हो, यह समय सबके मन में एक बार फिर से उत्साह जरूर ले कर आता है।   आप सबको भी इस अवसर पर अपार खुशियां मिले और आप सबकी ज़िन्दगी में एक प्यारा सा पार्टनर हो, इसी शुभेच्छा के साथ मैं अपना लेखन समाप्त करता हूँ।
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