Tuesday, February 4, 2014

दरिंदगी एक बार फिर केवल ४ वर्ष की बच्ची से

आज दिल्ली में ४ साल की बच्ची के साथ फिर बलात्कार की घटना हुई है।  ऐसे राक्षसों को कैसे सबक सिखाया जाए, किस तरह ऐसी घटनाओं को रोका जाए, किसी को समझ नहीं आ रहा।  कैसे किसी इंसान के मन में महज़ चार साल की बच्ची के लिए ऐसी सोच पैदा हो सकती है ?  और तो और यह बच्ची अपने घर के ही बाहर खेल रही थी, और बलात्कार करने वाला और कोई नहीं बल्कि उसके पड़ोस में रहने वाला ही एक युवा है जो उस बच्ची को वहाँ से उठा कर एक पार्क में ले जाकर ऐसा घृणित कृत्य करता है।  उस बच्ची के मानस पटल पर इसका कितना गहरा असर होगा, यह सोच कर भी रूह कॉप जाती है।  न जाने वह बच्ची किस अवस्था में है, अस्पताल में अपने जीवन की संघर्ष करती हुई यह बच्ची जिसे अभी संसार की बुराइयों के बारे में पता भी नहीं, एक नरभक्षी केवल एक चोकलेट के लालच में उसकी बोटी बोटी नोच लेता है। हालांकि इस दरिंदे को गिरफ्तार कर लिया गया है किन्तु ऐसी घटनाओं की बार बार पुर्नरावृति तथा युवाओं में पनपती ऐसी विपरीत मानसिकता के पीछे आखिर है क्या ?

क्या आपको नहीं लगता कि जहाँ एक तरफ क़ानून में महिलाओं के प्रति अशोभनीय व्यवहार के लिए सख्त से सख्त प्रावधान करने की कोशिश की जा रही है, वहीँ जिन चीज़ों को कानून के अनुसार फूहड़पन, वासना जनित अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया है, वो सब फिल्मों में न केवल खलनायकों द्वारा किये जाते बेरोकटोक दिखाए जाते हैं , बल्कि नायकों के द्वारा ऐसी कृत्यों के करने को सामान्य नोक झोंक की श्रेणी में डाल कर प्यार की शुरुआत की संज्ञा दे कर दर्शकों से ताली बटोरी जाती है।  फिल्में समाज को किस हद तक प्रभावित करती हैं, यह सर्वविदित है।  फिल्मों में आज कल जिस तरह से सेक्स और खुलेपन को बढ़ावा मिला है, वैसा आज से पहले कभी न था।   हर हाथ मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट के सस्ते दरों पर उपलब्धता इस मानसिक विकृति को पैदा करने में सहयोग कर रहे हैं।  किशोरावस्था में जब पोर्न क्लिप्स लोगों को उपलब्ध होंगे तो उनके मन में इस तरह के विचार आने स्वाभाविक ही हैं।

ऐसी घटनाएं रोकनी हैं तो हमारी सरकार को फिल्मों और इंटरनेट पर उपलब्ध वेब साइट्स को सख्ती के साथ रेगुलेट करना बहुत जरूरी है।  सेंसर बोर्ड्स को फिल्में पास करते समय, समाज में फ़ैल रही ऐसी विकृति को दिमाग में रख कर निर्णय लेना होगा।  हर गली नुक्कड़ पर, गाँव गाँव में पोर्न डिस्कस की उपलब्धता पर रोक लगानी होगी।  जहाँ ऐसे डिस्कस बनते हैं, उनके निर्माण व सप्लाई चेन को बंद करना होगा।  यह हज़ारो करोड़ का अवैधानिक एवं अनीतिक व्यापार बंद करना इतना आसान नहीं।  जहाँ न जाने कितने लोग सफेदपोश्त बन कर ऐसी घटनाओं का विरोध करते हैं, वहीँ इनमे से कई ऐसे हैं जिन्हे इन्ही विडियो पार्लर्स से हर हफ्ते अपने मनोरंजन के लिए ऐसी डिस्कस चाहिए होती है, वर्ना किसे पता नहीं कि हर गली नुक्कड़ पर ऐसी दुकाने हैं जहाँ ऐसी मूवीज की डिस्कस चंद  इतने रूपए में मिलते हैं जितने में आप एक कोन वाली आइस क्रीम खरीद सक्ते हैं।  और फिर इस व्यापार से होने वाली कमाई का एक बड़ा हिस्सा तो सरकारी महकमे में काम करने वाले उन लोगों को भी तो जाता है जिनका काम ऐसे अवैध कारोबार को रोकना है।

मित्रों, मैंने कुछ दिनों पहले अखबार में छपे एक रिपोर्ट में पढ़ा था कि किस तरह कूड़ा उठाने वाले बच्चे व किशोर अपनी दिन भर की कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन पोर्न मूवीज को देखने के लिए खर्च कर देते हैं।  कई बार तो ये ऐसी मूवीज को देखने के लिए वे अपना एक टाइम का खाना भी स्किप कर देते हैं।  आप पूछेंगे कि ऐसी मूवीज वो देखते कहा हैं ?  जी हाँ दिन में चाय और नाश्ते के रोड साइड कई स्टाल महानगरों में रात को दूकान बंद होने के बाद यह धंधा करते हैं।  यह रिपोर्ट अखबारों में तब आया था जब लोगों के विरोध के कारण ऐसी जगहों पर पुलिस को छापे मारने पड़े थे।  इसमें पकड़े गए ऐसे किशोरों से इंटरव्यू लेने के बाद कई नयी बातें पता चली थी।  बड़ी उम्र के किशोर अपने से छोटे बच्चों को जबर्दस्ती इस तरह की आदत डालते हैं और इसके एवज में इन किशोरों को कमीशन भी दिया जाता है।

हम सबों को इस बात को काफी गहराई से सोचने की जरूरत है कि इस विपरीत मानसिकता का शिकार कोई व्यक्ति हमारे पास पास कहीं भी हो सकता है और हम सबके बच्चे भी सुरक्षित नहीं हैं। ऐसी स्थिति में जहाँ हम बिजली, पानी, सड़क, वेतन वृद्धि की मांग करने के लिए जिस तरह आंदोलन करते हैं, क्या हमारा फ़र्ज़ नहीं है कि हम ऐसे कारोबार को बंद करने के लिए भी वैसे ही आंदोलन करें।  अपने आस पास के गली नुक्कड़ों में बिक रहे ऐसे डिस्कस के दुकानों पर ताला लगवाएं।  ऐसी फिल्मों को देखना बंद करें जिनमें आधुनिकता कि आड़ में फूहड़पन और सेक्स पेश किया जा रहा है।   मुझे आशा है मेरा यह प्रयास आप सबको जरूर सोचने पर मज़बूर करेगा।  धन्यवाद।
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