Tuesday, February 4, 2014

प्रेम और वात्सल्य का प्रतीक - बसन्तोत्सव

मित्रों, बसंत पंचमी का ख्याल आते ही मन में एक उमंग की लहर दौड़ उठती है।  क्या बड़े, बूढ़े, नौजवान और बच्चे, यह पर्व सबके जीवन में खुशियां ले कर आता है।  यह वह समय है जब ठण्ड की तीव्रता कम होने लगती है और मौसम काफी खुशनुमा हो जाता है।  बसंत का मौसम वैसे भी पिकनिक एवं सैर सपाटे के लिए बहुत अनुकूल माना जाता है।   प्रायः शहरों से ज्यादा गावों में इस पर्व पर उत्साह पाया जाता है।  गीत, संगीत, नाच, गाने, झूले, मेले ये सब कड़ाके की ठण्ड के विदा होते ही सजीव हो उठते हैं।  हिन्दू धर्म के अनुसार यह पर्व कामदेव व उनकी पत्नी रति के प्रेम का प्रतीक है।   श्रृंगार रस एवं वसंत राग में सराबोर इस मौसम का असर शादी शुदा युवा युगल जोड़ों तथा शादी योग्य युवक युवतियों में प्रेम और वात्सल्य के आदान प्रदान के रूप में भी देखा जा सकता है।

इस पर्व को सरस्वती पूजा के रूप में भी मनाया जाता है।   विद्या, बुद्धि, कौशल, विज्ञान, तकनीक, कला और ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की अराधना पूरी श्रध्धा एवं हर्षोल्लास के साथ की जाती है।  मंदिरों एवं शिक्षा संस्थानों में देवी की प्रतिमा को पीली साडी पहना कर पीले फूलों एवं आभूषणो से उनका श्रृंगार कर के उनकी पूजा की जाती है।  प्रसाद के रूप में नाना प्रकार के फल एवं मिठाइयां वितरित की जाती है।   कई स्थानो पर इस उपलक्ष्य में भोज भी आयोजित किये जाते हैं।   प्रेम व भक्ति रस में डूबे युवा शिक्षार्थी इस अवसर पर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश करते हैं।  शिक्षा शँस्थानो एवं होस्टल्स में हर्षोल्लास का ऐसा वातावरण होता है कि पूछो मत।  कतार में खड़े युवा नए नए वस्त्र पहन कर एक दूसरे के हॉस्टल में जा कर वहाँ की पूजा का आनंद लेते हैं, एक दूसरे के गालों पर गुलाल लगाते हैं और प्रसाद ले कर फिर अगले हॉस्टल या संस्थान की तरफ बढ़ जाते हैं।  इन संस्थानो एवं होस्टल्स में दूसरे से अच्छी पूजा का आयोजन करने की होड़ लगी रहती है।   मैंने अपने शिक्षण काल में यह सब बड़े नजदीक से अनुभव किया है।  साल का यही एक मात्र दिन होता है जब गर्ल्स हॉस्टल बॉयज के लिए खुला होता है और इस दौरान पूजा में शामिल युवक युवतियां अपने प्रेमी या प्रेमिका के उनके हॉस्टल आने का बेसब्री से इंतज़ार करते पाये जाते हैं।

मित्रों यह पर्व भारतवर्ष के विभिन्न प्रांतों में अलग अलग नामों से मनाया जाता है।  पंजाब में जहाँ इसे पतंगोत्सव के रूप में मनाया जाता है तो बंगाल में इसे श्रीपंचमी के नाम से जाना जाता है।  यह दिन युवाओं के लिए वैलेंटाइन डे का देसी संस्करण भी होता है।  युवतियां इस दिन अक्सर रंग बिरंगी साड़ियां पहनती हैं और अपने साथी के साथ यह वक़्त गुजारना पसंद करती हैं।  वसंत पंचमी से ले कर अगले ४० दिन हर्षोल्लास, लोक गीत, लोक नृत्य एवं अन्य सांस्कृतिक आयोजनो का समय होता है जिसका अंत होलिका दहन एवं होली के पावन पर्व के रूप में होता है।  मित्रों, आप भी वसंत के रंगों में शामिल हो जाइये और अपने जीवन के सारे दुःख एवं परेशानियों को भूल कर इस वासंती मौसम का भरपूर आनंद लीजिये।  आप सभी को वसंत पंचमी एवं सरस्वती  पूजा का हार्दिक अभिनन्दन !

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