Thursday, February 25, 2016

इंसानो की हवस के सामने बेबस हमारी प्रकृति

इंसानों ने जानवरो के घर उजाड़ दिये। न रहे घने जंगल, न रही निर्मल स्वच्छ नदियों की शीतल धारा। अब बेचारे ये जंगल के जानवर जाएँ तो कहाँ जाएँ। पैसे कमाने के जूनून में ज्यादा से ज्यादा जमीनों पर कब्ज़ा करने की जैसे होड़ सी मच गयी है। चाहे वो निजी जमीन हो या सरकारी जमीन, संरक्षित जमीन हो या नदी तट के इलाके। आज तो नदियों के मुहाने मोड़ कर, उनके रास्ते रोक कर भी ज़मीनो पर कब्जा किया जा रहा है। कहीं तो उद्योग धंधे लगाए जा रहे हैं, कही खनन किया जा रहा है तो कहीं ऊँची ऊँची इमारते खड़ी की जा रही हैं। खेतों के जमीन जब तेजी से अन्य कार्यों हेतु व्यवहार में लाये जा रहे हैं, फिर खेती की ज़मीन कहाँ से आये? इसके लिए फिर जंगल काट कर खेती योग्य भूमि तैयार की जा रही है। पर्वतीय इलाकों में चट्टानों को काट काट कर समतल किया जा रहा है। पहाड़ नंगे हो रहे हैं। क्या हो गया है हम सब को? हम क्यूँ नहीं सीखते दक्षिण तटीय इलाकों में आये भयंकर सुनामी से, भुज में आये विनाशकारी भूकम्प से या उतराखंड में आयी भयावह त्रास्दी से ?
हर कुछ दिनों पर हम अखबारों में पढ़ते हैं कि ट्रैन से कट कर एक व्यस्क हाथी मारा गया। फिर कई हाथियों ने अपने साथी के मारे जाने से नेशनल हाईवे जाम करके रखा है। हाथियों के झुण्ड ने भोजन की तलाश में गाँव के खेत खलियान नष्ट कर दिए। कई घरों में तबाही मचा दी। अभी सुना एक हाथी के ढाई साल का बच्चा उसकी माँ के बीमार होने के वजह से अपने झुण्ड को छोड़ माँ के साथ ही रह गया। उसकी माँ को बचाने की बहुत कोशिश की गयी मगर वो बच न सकी। उसकी माँ के मरने के बाद भी वो उसके मृत शरीर के आस पास से हटने को तैयार न हुआ। न जाने अपने झुण्ड से अलग होने के बाद उस बच्चे का क्या होगा? शायद उसे किसी चिड़ियाखाने में लोगो के मनोरंजन के लिए रख देंगे।
एक तेंदुआ जो जंगल से भटक कर मेरठ शहर में इस घर से उस घर, इस गली से उस गली, मॉल एवं बाजारों में घूम रहा है। वह तो खुद खौफजदा है, इतने सारे इंसानो के बीच। एक बार शहर में आ जाने के बाद उसे वापस जंगल जाने का रास्ता नहीं मिल रहा, वैसे भी आज शहर जंगल से ज्यादा बड़े हो चुके हैं। सूना रणथम्बोर का एक बाघ नरभक्षी बन चूका है। वह भी इंसानो के बस्तियों में घूम रहा है, अब तक सात लोगों को मार चुका है। उसको मारने के लिए बड़े बड़े शिकारी लगा दिए गए हैं। विगत वर्षों में ऐसी घटनाओ में अक्सर नरभक्षी बाघों के बजाये निर्दोष बाघों को मार दिया गया। सुंदरवन के बाघों की भी क्या गलती है, वे बेचारे तो जंगल में ही रहते आये हैं, मगर इंसानो ने वहाँ भी दूर दूर तक अपनी बस्तियां बसा ली हैं, टूरिस्ट सेण्टर, होटल्स खोल रखे हैं। अब हर कुछ महीनो में बाघों के इंसानो पर अटैक की खबरें आती हैं तो इसमें दोष किसका है? कभी हमारे भारत वर्ष में पुरे क्षेत्रफल का ८५ पर्तिशत जंगल हुआ करता था आज शायद १० पर्तिशत भी सही मायने में न बचे हों। क्या हम और हमारी सरकार इस और पूरी निष्ठां के साथ सोचेंगे ? अगर हमारे जंगल, नदियां, पर्वत, पशु, पक्षी नहीं रहेंगे तो फिर हमारा पर्यावरण क्या हम इंसानो के रहने के लायक बचेगा? नहीं चाहिए ऐसी तरक्की जिसमे इंसानो के हवस के वजह से प्रकृति इस कदर तबाह हो रही हो।
मित्रों, मैंने यह पोस्ट ठीक दो साल पहले लिखा था।   इसमें वर्णित घटनाएं उसी समय को प्रतिबिंबित करती हैं।
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