एक सलौनी सी गुड़िया
चाँद सी शीतल
हृदय से चंचल
रूप में बरखा
करुणा की सरिता ।
खन-खन करती जिसकी आवाज़
कर दे जो दिल के कण कण गुलज़ार
जागती तो लगे जैसे कोई परी हो
सोती सी लगे जैसे मंदिर की देवी हो ।
मन के इस उजाड़ आँगन को
बरसों के सूनेपन को
कब से है इंतज़ार कि
दिल के अंतरंग तरंगों को छूने
आँखों में बसे अनंत सपनो को मूर्त स्वरुप देने
होले से वो आएगी ।
एक बार खुल के जीने को
फिर हसने को हसाने को
इन आँखों को मुस्कुराने को
इन होठों को गुदगुदाने को
इन लब्ज़ों को गुनगुनाने को
खुशियों की दौलत लुटाने को
वो आएगी
हाँ वो आएगी !!
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चाँद सी शीतल
हृदय से चंचल
रूप में बरखा
करुणा की सरिता ।
खन-खन करती जिसकी आवाज़
कर दे जो दिल के कण कण गुलज़ार
जागती तो लगे जैसे कोई परी हो
सोती सी लगे जैसे मंदिर की देवी हो ।
मन के इस उजाड़ आँगन को
बरसों के सूनेपन को
कब से है इंतज़ार कि
दिल के अंतरंग तरंगों को छूने
आँखों में बसे अनंत सपनो को मूर्त स्वरुप देने
होले से वो आएगी ।
एक बार खुल के जीने को
फिर हसने को हसाने को
इन आँखों को मुस्कुराने को
इन होठों को गुदगुदाने को
इन लब्ज़ों को गुनगुनाने को
खुशियों की दौलत लुटाने को
वो आएगी
हाँ वो आएगी !!
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