दो दिन बाकी हैं रंगो के उत्सव होली के आने में। मगर चारों तरफ इसकी छटा और खुश्बू अभी से महसूस की जा रही है। दुकाने रंग बिरंगे गुलालो एवं रंगो से सज चुकी हैं। छोटी, बड़ी एवं मध्यम आकार की पिचकारियाँ भी दुकानों में दिख रही हैं। होली के अवसर पर तमाम तरह की जोकर वाली टोपियां भी दुकानो में सज गयी हैं। मिठाई की दुकानें तरह तरह की मीठाइयों से सज चुकी हैं। यह वह समय है जब लोग जी खोल कर इस त्यौहार को आंनदमय बनाने के लिए खर्च करते हैं। नए कपडे, गिफ्ट्स, मिठाइयां, नाना प्रकार के व्यंजन, ड्राई फ्रूट्स, तरह तरह के शीतल पेय, रंग-गुलाल और घरों की साफ़- सफाई व साज- सजावट। दुकानदारों के लिए भी यह समय काफी कमाई करने का समय है। सबके मन में खुशियां हिलोरे ले रही होती हैं। क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या जवान। दूसरे शहरों में जा कर पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी हों या नौकरी पेशा लोग, इस समय सब अपने घर जरूर आते हैं और सपरिवार यह ख़ुशी मनाते हैं।
आज मेरे दफ्तर में मुझे जरा भी एहसास न था कि आज मैं भी होली के रंगो में रंगा जाउंगा। रोज की ही भाँती आज भी दफ्तर में काफी कार्य था जिसमे मुझे कुछ सोचने कि फुर्सत शायद ही मिलती है। शाम को करीब ६ बजे मैंने देखा हमारे कुछ युवा सहकर्मी एक दूसरे को होली के गुलालो से रंग रहे थे। चुकी मेरी तैयारी कुछ नहीं थी, मैंने सोचा कि मैं चुपके से निकल जाऊं। मगर जैसे ही मैं करीब ६.३० पर अपने दफ्तर से बाहर निकला, देखा दफ्तर के मुख्य द्वार पर वही सहकर्मी इंतज़ार में थे कि जो लोग बचे हुए हैं, उनको रंगना है। और फिर वही हुआ जो होना था, मैं भी रंगा गया। मित्रों, होली मिलन का एक बहुत ही प्यारा एहसास होता है। होली प्रेम और सौहार्द का प्रतीक है। इसमें शरारत है, मस्ती है और एक दूसरे के प्रति स्नेह दर्शाने का एक जरिया भी है। होली दफ्तर के अपने सहकर्मियों के साथ हो, अपने पड़ोसियों के साथ हो, मित्रों या परिवार जनों के साथ हो, आज के काफी व्यस्त जीवन शैली के बीच, यह पर्व हमें एक बार फिर बच्चों की तरह बन जाने का मौका देता है। यह अवसर देता है कि हम उन सब लोगों से यह जाहिर कर सकें की हम साल के बाकी दिनों में उनके लिए भले ही उतना समय न दे सकें, मगर हमारी आपस की मित्रता, अपनापन कभी कम नहीं होती। और फिर इस दिन हम उसी एहसास को पुनर्जीवित करने की भरपूर कोशिश करते हैं। आज ऐसा लग रहा था जैसे अपने उन युवा सहकर्मियों के बीच जो मुझसे उम्र में कुछ छोटे ही हैं, उन्हें इस बात की बहुत ख़ुशी हुई कि मैंने उनकी बात मान कर उनके साथ होली खेली। मुझे भी यह बहुत अच्छा लगा, ऐसा लग रहा था कि मैं अपने शहर से दूर होते हुए भी उन लोगों के बीच हूँ जो मेरे साथ अपनी खुशिया बाटना चाहते हैं। बस एक बात की टीस रह गयी की उनमे से एक मित्र ने मेरे साथ होली खेलने से इंकार कर दिया। कहते हैं कि होली एक ऐसा पर्व है जहाँ दुश्मनो को भी माफ़ कर गले लगाया जाता है। और फिर हम तो कभी दुश्मन भी नहीं रहे। मैंने तो अपने हाथ हमेशा दोस्ती के लिए बढाए थे, मगर उन्हें ही शायद मेरी दोस्ती रास न आयी।
आज इस मौके पर होली के ऊपर बने बीते जमाने के एक बहुत ही प्यारे से गीत का यह अंश याद आ रहा है -
"अपनी अपनी किस्मत है ये, कोई हसे, कोई गाये ………… कोई हसे कोई गाये। "
आप सबों को होली के पावन पर्व पर ढेर सारी बधाइयां !
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मित्रों यदि मेरा यह पोस्ट आपके दिल को जरा भी छू कर गुजरा हो तो मुझे विश्वास है कि आप मेरे इस प्रयास को लाइक दे कर मुझे और भी अच्छा लिखने की प्रेरणा, स्नेह और आशीर्वाद देंगे। आप अगर मुझे मेरे फेसबुक प्रोफाइल पर फॉलो करते हैं तो आपको मेरे शेयर किये सारे पोस्ट्स आपके नोटिफिकेशन्स में मिलते रहेंगे।
आज मेरे दफ्तर में मुझे जरा भी एहसास न था कि आज मैं भी होली के रंगो में रंगा जाउंगा। रोज की ही भाँती आज भी दफ्तर में काफी कार्य था जिसमे मुझे कुछ सोचने कि फुर्सत शायद ही मिलती है। शाम को करीब ६ बजे मैंने देखा हमारे कुछ युवा सहकर्मी एक दूसरे को होली के गुलालो से रंग रहे थे। चुकी मेरी तैयारी कुछ नहीं थी, मैंने सोचा कि मैं चुपके से निकल जाऊं। मगर जैसे ही मैं करीब ६.३० पर अपने दफ्तर से बाहर निकला, देखा दफ्तर के मुख्य द्वार पर वही सहकर्मी इंतज़ार में थे कि जो लोग बचे हुए हैं, उनको रंगना है। और फिर वही हुआ जो होना था, मैं भी रंगा गया। मित्रों, होली मिलन का एक बहुत ही प्यारा एहसास होता है। होली प्रेम और सौहार्द का प्रतीक है। इसमें शरारत है, मस्ती है और एक दूसरे के प्रति स्नेह दर्शाने का एक जरिया भी है। होली दफ्तर के अपने सहकर्मियों के साथ हो, अपने पड़ोसियों के साथ हो, मित्रों या परिवार जनों के साथ हो, आज के काफी व्यस्त जीवन शैली के बीच, यह पर्व हमें एक बार फिर बच्चों की तरह बन जाने का मौका देता है। यह अवसर देता है कि हम उन सब लोगों से यह जाहिर कर सकें की हम साल के बाकी दिनों में उनके लिए भले ही उतना समय न दे सकें, मगर हमारी आपस की मित्रता, अपनापन कभी कम नहीं होती। और फिर इस दिन हम उसी एहसास को पुनर्जीवित करने की भरपूर कोशिश करते हैं। आज ऐसा लग रहा था जैसे अपने उन युवा सहकर्मियों के बीच जो मुझसे उम्र में कुछ छोटे ही हैं, उन्हें इस बात की बहुत ख़ुशी हुई कि मैंने उनकी बात मान कर उनके साथ होली खेली। मुझे भी यह बहुत अच्छा लगा, ऐसा लग रहा था कि मैं अपने शहर से दूर होते हुए भी उन लोगों के बीच हूँ जो मेरे साथ अपनी खुशिया बाटना चाहते हैं। बस एक बात की टीस रह गयी की उनमे से एक मित्र ने मेरे साथ होली खेलने से इंकार कर दिया। कहते हैं कि होली एक ऐसा पर्व है जहाँ दुश्मनो को भी माफ़ कर गले लगाया जाता है। और फिर हम तो कभी दुश्मन भी नहीं रहे। मैंने तो अपने हाथ हमेशा दोस्ती के लिए बढाए थे, मगर उन्हें ही शायद मेरी दोस्ती रास न आयी।
आज इस मौके पर होली के ऊपर बने बीते जमाने के एक बहुत ही प्यारे से गीत का यह अंश याद आ रहा है -
"अपनी अपनी किस्मत है ये, कोई हसे, कोई गाये ………… कोई हसे कोई गाये। "
आप सबों को होली के पावन पर्व पर ढेर सारी बधाइयां !
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