Sunday, February 26, 2017

इस जगत के दो संस्कार


इस जगत के दो संस्कार 
कही तृष्णा और वासना 
तो कही करुणा और वात्सल्य
कहीं है झूठ और मक्कारी
तो कही सच्चाई और ईमान
कोई है कामचोर
तो कोई है कर्मयोगी
कोई भागे दायित्व से
तो कोई सेवा करने को आतुर
इस जगत में किसी को पहचानूं तो कैसे
खुद को तो पहचान न सका।
ढूंढने चला जब सुंदरता मन की
मिलता नहीं एक भी कोई।
 फिर कोसता खुद की किस्मत
कहाँ पैदा हुआ, पला- बढ़ा।
खुद को अच्छा कहने की बीमारी से ग्रसित
मैं दुसरो में बुराइयाँ देखता रहा।
भूल गया मेरी तरह न जाने कितने ढूंढते
मेरे मन की भी सुंदरता।
संस्कार के इस कसमकस में
हर कोई डूबा, न पार सका।

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