इस जगत के दो संस्कार
कही तृष्णा और वासना
तो कही करुणा और वात्सल्य
कहीं है झूठ और मक्कारी
तो कही सच्चाई और ईमान
कोई है कामचोर
तो कोई है कर्मयोगी
कोई भागे दायित्व से
तो कोई सेवा करने को आतुर
इस जगत में किसी को पहचानूं तो कैसे
खुद को तो पहचान न सका।
ढूंढने चला जब सुंदरता मन की
मिलता नहीं एक भी कोई।
फिर कोसता खुद की किस्मत
कहाँ पैदा हुआ, पला- बढ़ा।
खुद को अच्छा कहने की बीमारी से ग्रसित
मैं दुसरो में बुराइयाँ देखता रहा।
भूल गया मेरी तरह न जाने कितने ढूंढते
मेरे मन की भी सुंदरता।
संस्कार के इस कसमकस में
हर कोई डूबा, न पार सका।
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